‘खेतों और खलिहानों से होकर गुज़रेगा 2047 के विकसित भारत का रास्ता’
लोकसभा अध्यक्ष का बड़ा बयान, परंपरा और 'एग्री-टेक' से बदलेगी देश की तकदीर

अभिषेक सिंह नई दिल्ली | भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ (Developed Nation) बनाने का सपना अगर महलों, चमकते एक्सप्रेसवे और कॉरपोरेट बोर्डरूम में बैठकर देखा जा रहा है, तो वह सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। देश के भाग्य का असल फैसला आज भी गांव की चौपालों और पसीने से सींचे गए खेतों में होता है। इसी कड़वी और जमीनी सच्चाई को केंद्र में रखते हुए, लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने आज एक बेहद महत्वपूर्ण विमर्श की शुरुआत की है। “विकसित भारत @2047 के लिए सतत कृषि: परंपरा, प्रौद्योगिकी और ठोस परिणाम” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि 2047 तक भारत का विकसित राष्ट्र बनने का मार्ग सीधे तौर पर उसके खेतों, किसानों और गांवों से होकर गुजरता है।
परंपरा और प्रौद्योगिकी (Tech) का महा-समन्वय
उद्घाटन सत्र में अपने धारदार संबोधन में लोकसभा अध्यक्ष ने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह है भारतीय कृषि में ‘परंपरा’ (Tradition) और ‘प्रौद्योगिकी’ (Technology) का समन्वय। भारत के किसानों के पास मौसम और मिट्टी को समझने का हजारों साल पुराना पारंपरिक ज्ञान है, लेकिन जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ती आबादी के इस दौर में केवल पारंपरिक ज्ञान काफी नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सतत कृषि (Sustainable Agriculture), नवाचार (Innovation) और जमीनी अनुसंधान ही ‘विकसित भारत’ की सबसे सुदृढ़ आधारशिला हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में खेती सिर्फ ट्रैक्टर और ट्यूबवेल तक सीमित नहीं रहेगी। ड्रिप इरिगेशन, एआई (AI) आधारित मौसम पूर्वानुमान, मिट्टी की सेहत जांचने वाले सेंसर्स और खेतों में कीटनाशक छिड़कने वाले ‘एग्रीकल्चरल ड्रोन्स’ ही भारतीय कृषि का नया भविष्य होंगे। जब हमारी पुरानी बीज संरक्षण परंपराओं को इस नई तकनीक का साथ मिलेगा, तभी भारत कृषि क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व (Global Leadership) प्रदान कर सकेगा।
नीतिगत बदलाव का स्पष्ट संकेत
एक राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषक के तौर पर इस सम्मेलन और इसमें दिए गए बयानों के निहितार्थ बहुत गहरे हैं। यह सरकार की उस नीतिगत ‘शिफ्ट’ (Shift) को दर्शाता है, जहाँ यह मान लिया गया है कि देश की 5 ट्रिलियन या 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था केवल आईटी (IT) सेक्टर या मैन्युफैक्चरिंग के दम पर खड़ी नहीं की जा सकती। जब तक देश की आधी से अधिक आबादी, जो आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होगी, तब तक ‘विकसित भारत’ का टैग एक भ्रम रहेगा।
“ठोस परिणाम” (Tangible Results) शब्द का इस्तेमाल यह बताता है कि सरकार अब केवल कागजी योजनाओं या सब्सिडी से आगे बढ़कर ज़मीन पर उत्पादकता और किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि देखना चाहती है। यह सम्मेलन इस बात का भी लिटमस टेस्ट है कि भारत अपने ‘अन्नदाता’ को एक ‘कृषि-उद्यमी’ (Agri-Entrepreneur) में कैसे बदलता है। अगर हम इस ‘एग्री-टेक’ क्रांति को हर छोटे और सीमांत किसान तक पहुंचाने में सफल रहे, तो 2047 का भारत सिर्फ अपनी आबादी का पेट नहीं भरेगा, बल्कि वह पूरी दुनिया की ‘फूड बास्केट’ (Food Basket) बन जाएगा।