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पिता की दूरदर्शिता और बेटे का जुनून, गुरनूर बरार का अनोखा सफर

जब सुखबीर सिंह बरार को यह पता चला कि उनके किशोर बेटे गुरनूर को क्रिकेट का बेहद शौक है, तो उन्होंने उसके सपनों को साकार करने में मदद करने का फैसला तुरंत कर लिया। इसके पीछे दो कारण थे।

पहला, वह अपने बेटे के लिए एक सहयोगी और प्रोत्साहन देने वाले पिता बनना चाहते थे। दूसरा, पंजाब पुलिस में एएसआई के पद पर कार्यरत होने के कारण उन्हें लगा कि क्रिकेट 17 वर्षीय बेटे को बुरी संगत से दूर रखने का एक बेहतरीन माध्यम साबित हो सकता है।

चंडीगढ़ के सेक्टर-125 स्थित अपने आलीशान घर में एक समाचार एजेंसी को दिए एक साक्षात्कार में सुखबीर ने अपने तेज गेंदबाज बेटे के क्रिकेट सफर के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने कहा, “जब वह किशोरावस्था के अंतिम चरण में पहुंच रहा था, तब मैं चाहता था कि पढ़ाई के साथ-साथ वह किसी खेल में भी सक्रिय रहे, ताकि उसके पास किसी और चीज में पड़ने का समय ही न बचे।”

साभार : गूगल

उन्होंने मुस्कुराते हुए आगे कहा, “इसके अलावा व्यवस्थित कोचिंग का मतलब है कि आप बुरी संगत से दूर रहते हैं। जैसे ही गुरनूर कोच रवि सर की देखरेख में ‘चैम्प्स अकादमी’ से जुड़ा, उसने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

गुरनूर ने 11वीं कक्षा में क्रिकेट खेलना शुरू किया था और आज, 26 वर्ष की उम्र में, वह भारत की टेस्ट और एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं। हालांकि, उन्हें अब तक राष्ट्रीय टीम की ओर से पदार्पण का अवसर नहीं मिला है। गुरनूर से केवल एक इंच छोटे और छह फीट चार इंच लंबे सुखबीर अपने बेटे के उज्ज्वल भविष्य को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं।

1995 की राष्ट्रीय बास्केटबॉल चैंपियनशिप में पंजाब का प्रतिनिधित्व कर चुके सुखबीर ने कहा, “मैं एक पुलिसकर्मी हूं, लेकिन गुरनूर की मां मनविंदर से भी ज्यादा भावुक हो जाता हूं। जब हमें उसके भारतीय टीम में चयन की खबर मिली, तो मेरी आंखों में आंसू आ गए थे।”

बरार परिवार को यह खुशखबरी भी बेटे से बेहद सामान्य अंदाज में मिली। सुखबीर ने बताया, “जिस दिन अफगानिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच के लिए टीम की घोषणा हुई, उस समय हम परिवार में हुई एक मृत्यु के कारण मुक्तसर साहिब स्थित अपने पुश्तैनी घर पर थे। आईपीएल के दौरान गुरनूर शाम को अभ्यास करता था, इसलिए वह दोपहर में सो जाता था और हमेशा अपनी मां से कहता था कि उसे शाम 4:45 बजे जगा दें।”

उन्होंने आगे कहा, “उस दिन मेरी पत्नी ने उसे जगाने के लिए फोन किया और पूछा, ‘क्या आज टीम की घोषणा नहीं होनी थी?’ गुरनूर ने जवाब दिया, ‘हां मां, मेरा चयन हो गया है।’ इतना कहकर उसने फोन रख दिया।” सुखबीर को याद है कि गुरनूर ने अपने हमउम्र बच्चों की तुलना में काफी देर से क्रिकेट खेलना शुरू किया था, जबकि अधिकांश बच्चों को नौ या दस साल की उम्र में ही क्रिकेट अकादमियों में भेज दिया जाता है।

उन्होंने कहा, “पुलिस सेवा में होने के कारण मेरे पास अपने दोनों बेटों के बड़े होने के दौरान बहुत कम समय होता था। गुरनूर की 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं समाप्त होने के बाद मैंने उसे बास्केटबॉल खेलने के लिए कहा, क्योंकि मैं स्वयं भी यह खेल खेल चुका हूं और हमारी लंबाई भी अच्छी है।”

उन्होंने बताया, “गुरनूर ने दो-तीन सप्ताह तक बास्केटबॉल खेला, लेकिन फिर उसने मुझसे कहा, ‘पापा, मुझे इसमें मजा नहीं आ रहा है।'” भारत में विश्वविद्यालय क्रिकेट अब 1970, 1980 और 1990 के दशक जैसा प्रभावशाली नहीं रहा, लेकिन गुरनूर को पहला बड़ा अवसर तब मिला जब उन्होंने अंतर-कॉलेज टूर्नामेंट में चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने सेमीफाइनल और फाइनल दोनों मुकाबलों में ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ का पुरस्कार जीता।

उसी प्रदर्शन के आधार पर मोहाली जिला क्रिकेट संघ ने उन्हें कटोच शील्ड, जो पंजाब का सबसे प्रतिष्ठित अंतर-जिला टूर्नामेंट माना जाता है, के लिए अपनी टीम में शामिल किया।

इसके बाद गुरनूर का क्रिकेट सफर लगातार आगे बढ़ता गया। अपनी लंबाई और सटीक लेंथ के दम पर अतिरिक्त उछाल हासिल करने की क्षमता ने राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का ध्यान उनकी ओर खींचा। भारतीय टीम प्रबंधन ने उन्हें पहली बार नेट गेंदबाज के रूप में तब बुलाया, जब टीम को छह फीट पांच इंच लंबे बांग्लादेशी तेज गेंदबाज नाहिद राणा जैसी गेंदबाजी का अभ्यास करना था।

सुखबीर ने कहा, “उसे विशेष रूप से इसलिए बुलाया गया था ताकि वह बल्लेबाजों को नाहिद राणा का सामना करने से पहले उसी तरह की गेंदबाजी के खिलाफ अभ्यास करा सके। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ए और दक्षिण अफ्रीका ए के खिलाफ घरेलू मुकाबलों में उसका प्रदर्शन शानदार रहा और अब उसे भारतीय टीम में जगह मिल गई है।”

गुरनूर जल्द ही भारत ए टीम के साथ श्रीलंका दौरे पर जाएगा, जहां वह चार दिवसीय प्रारूप के दो मैच खेलेगा। हालांकि, जब सुखबीर से पूछा गया कि क्या वह और उनकी पत्नी उसके साथ श्रीलंका जाना चाहेंगे, तो उन्होंने इससे साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “अगर मैं और मेरी पत्नी श्रीलंका जाएंगे, तो उसका ध्यान हमारी चिंता में बंट सकता है। इस समय उसे केवल अपने खेल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।”

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