‘एक देश एक चुनाव’ की ओर बढ़ते कदम
उच्च स्तरीय समिति ने राष्ट्रपति को सौंपी पूरक रिपोर्ट, विधानसभाओं के कार्यकाल में संशोधन का कानूनी खाका तैयार

नई दिल्ली (पल्लवी श्रीवास्तव): भारत की लोकतांत्रिक और चुनावी प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने वाली महत्वाकांक्षी नीति ‘एक देश एक चुनाव’ (One Nation One Election) को लेकर एक बहुत बड़ी और निर्णायक प्रगति हुई है। इस व्यवस्था को लागू करने की संभावनाओं और कानूनी पहलुओं की जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति ने अपनी विस्तृत पूरक रिपोर्ट (Supplementary Report) देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। इस ताजा रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि इसमें देश भर के राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में सामंजस्य बिठाने और आवश्यक संशोधनों के लिए एक स्पष्ट, ठोस और व्यापक कानूनी खाका (Legal Blueprint) सुझाया गया है।
पूरक रिपोर्ट के मुख्य बिंदु और कानूनी सिफारिशें
इस उच्च स्तरीय समिति ने अपनी पूरक रिपोर्ट में इस बात पर गहनता से ध्यान केंद्रित किया है कि देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कैसे कराए जाएं, क्योंकि वर्तमान में लगभग हर छह महीने में देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव हो रहे होते हैं।
समिति ने इस चक्र को तोड़ने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों में बदलाव का कानूनी प्रस्ताव तैयार किया है:
विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती और विस्तार का फॉर्मूला
रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह दिया गया है कि ‘एक देश एक चुनाव’ के पहले चरण को शुरू करने के लिए कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को कुछ महीनों के लिए बढ़ाया जा सकता है, जबकि कुछ अन्य राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त (कटौती) किया जा सकता है। इसका उद्देश्य सभी राज्यों के चुनावी चक्र को लोकसभा के चुनावी चक्र के साथ एक ही समय पर (सिंक्रोनाइज़) लाना है।
अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन का प्रस्ताव
समिति ने सिफारिश की है कि संसद को संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि) और अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) में आवश्यक संशोधन करने होंगे। इस संशोधन के तहत यह प्रावधान किया जाएगा कि यदि कोई राज्य सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले गिर जाती है, तो वहां शेष बची अवधि (Remainder Period) के लिए ही नई सरकार का चुनाव होगा, न कि पूरे पांच साल के लिए। इससे पूरे देश का चुनावी कैलेंडर कभी नहीं बिगड़ेगा।
इसके पक्ष और विपक्ष में उठते राजनीतिक सुर
इस रिपोर्ट के राष्ट्रपति के पास पहुंचने के बाद देश का राजनीतिक तापमान एक बार फिर बढ़ गया है। सरकार और इस नीति के समर्थकों का तर्क है कि ‘एक देश एक चुनाव’ से देश को बार-बार होने वाले आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के झंझट से मुक्ति मिलेगी, जिससे विकास कार्य कभी नहीं रुकेंगे। इसके अलावा, हजारों करोड़ रुपये के चुनावी खर्च की बचत होगी और सुरक्षा बलों तथा प्रशासनिक मशीनरी पर बार-बार पड़ने वाला बोझ समाप्त होगा।
संघीय ढांचे की चुनौती: दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल और कई क्षेत्रीय संगठन इस रिपोर्ट का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में इस तरह का मनमाना बदलाव देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) और क्षेत्रीय स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
बहरहाल, समिति की यह पूरक रिपोर्ट अब केंद्र सरकार के पास विचार के लिए जाएगी। सरकार इस कानूनी खाके को संसद के आगामी सत्रों में एक विधेयक के रूप में पेश करने की तैयारी कर सकती है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार इस भारी राजनीतिक विरोध के बीच इस ऐतिहासिक और जटिल सुधार को जमीन पर कैसे उतारती है।



