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अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस : बच्चों की सुरक्षा के प्रति वैश्विक जागरूकता का अभियान

अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस’ (International Missing Children’s Day) हर साल 25 मई को दुनियाभर में मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य गुमशुदा बच्चों की तलाश, उनकी सुरक्षा और बच्चों से जुड़े अपराधों के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना है। यह दिन केवल उन बच्चों को याद करने का अवसर नहीं है जो किसी कारणवश अपने परिवार से बिछड़ गए, बल्कि यह समाज, प्रशासन और परिवारों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार और सतर्क बनने का संदेश भी देता है। आधुनिक दौर में इंटरनेट, शहरीकरण और बढ़ती सामाजिक चुनौतियों के बीच बच्चों के गुम होने की घटनाएं लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं।

बच्चों की सुरक्षा के लिए शुरू हुआ अंतर्राष्ट्रीय अभियान

अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस की शुरुआत अमेरिका से हुई थी। 25 मई 1979 को न्यूयॉर्क शहर में छह वर्षीय इटन पैट्ज नाम का बच्चा अचानक लापता हो गया था। उसके परिवार और पुलिस ने लंबे समय तक उसकी तलाश की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल पाया। इस घटना ने पूरे अमेरिका को झकझोर दिया और बच्चों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू हुई। इसके बाद वर्ष 1983 में अमेरिका ने 25 मई को ‘नेशनल मिसिंग चिल्ड्रन्स डे’ के रूप में मनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह अभियान अन्य देशों तक पहुंचा और बाद में इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। आज दुनिया के कई देशों में यह दिवस बच्चों की सुरक्षा और गुमशुदा बच्चों की खोज के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है।

भारत में भी गुमशुदा बच्चों की समस्या गंभीर बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए जाते हैं। हालांकि पुलिस, बाल संरक्षण इकाइयों और सामाजिक संगठनों की मदद से कई बच्चों को सुरक्षित वापस लाया जाता है, लेकिन कुछ मामलों में बच्चों का लंबे समय तक कोई सुराग नहीं मिल पाता। देश में मानव तस्करी और बाल श्रम जैसी समस्याएं भी गुमशुदा बच्चों के मामलों को बढ़ाती हैं। कई बार गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चे अपराधियों के निशाने पर आ जाते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस, प्रशासन और समाज के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता महसूस की जाती है।

सरकार और संगठनों की पहल

गुमशुदा बच्चों को खोजने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा कई पहलें की जा रही हैं। भारत सरकार ने ‘ट्रैक चाइल्ड पोर्टल’ और ‘खोया-पाया पोर्टल’ जैसी ऑनलाइन सुविधाएं शुरू की हैं, जिनके माध्यम से गुमशुदा बच्चों की जानकारी साझा की जा सकती है। इसके अलावा बच्चों की सहायता के लिए 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन भी संचालित की जा रही है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और सार्वजनिक स्थलों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर निगरानी बढ़ाई गई है। पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल समय-समय पर अभियान चलाकर संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक का उपयोग भी बच्चों की पहचान और तलाश में तेजी लाने के लिए किया जा रहा है।

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