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ब्रिक्स (BRICS) का ऐतिहासिक कदम

डॉलर के वर्चस्व को सीधी चुनौती, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार पर बनी अभूतपूर्व सहमति

नई दिल्ली/मास्को (अंतरराष्ट्रीय एवं अर्थव्यवस्था डेस्क): वैश्विक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के पटल पर एक बड़े और निर्णायक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। हाल ही में संपन्न हुई ‘ब्रिक्स’ (BRICS – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देश) देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की वार्षिक बैठक में एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है, जो अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के दशकों पुराने एकछत्र वर्चस्व को समाप्त कर सकता है। सदस्य देशों ने आपसी व्यापार और वित्तीय लेन-देन में डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ‘स्थानीय मुद्राओं’ (Local Currencies) के उपयोग पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक सहमति व्यक्त की है। आर्थिक विश्लेषक इसे ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) या ‘डॉलर विमुद्रीकरण’ की दिशा में अब तक का सबसे ठोस कदम मान रहे हैं।

डॉलर से दूरी बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ (Forex Reserve) की मुख्य मुद्रा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, अमेरिका ने डॉलर का उपयोग एक ‘आर्थिक हथियार’ (Weaponization of Currency) के रूप में करना शुरू कर दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध और उसे ‘स्विफ्ट’ (SWIFT) अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली से बाहर करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इन प्रतिबंधों ने भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता उनकी आर्थिक संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।

क्या है नई व्यवस्था और यह कैसे काम करेगी?
इस नई पहल के तहत, ब्रिक्स देश द्विपक्षीय व्यापार के लिए ‘मुद्रा विनिमय समझौतों’ (Currency Swap Agreements) को बढ़ावा देंगे। उदाहरण के लिए, यदि भारत और रूस के बीच व्यापार होता है, तो उसका भुगतान डॉलर के बजाय ‘रुपया-रूबल’ (Rupee-Ruble) तंत्र के माध्यम से किया जाएगा। इसी तरह चीन और ब्राज़ील ‘युआन और रियाल’ में व्यापार करेंगे। इसके लिए ब्रिक्स देश अपनी स्वयं की एक स्वतंत्र ‘अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली’ विकसित करने पर भी तेजी से काम कर रहे हैं, जो पूरी तरह से पश्चिमी देशों के नियंत्रण से मुक्त होगी।

भारत के लिए इसके रणनीतिक और आर्थिक मायने
भारत के दृष्टिकोण से यह कदम अत्यंत लाभकारी है। स्थानीय मुद्रा (भारतीय रुपये) में व्यापार होने से भारत के बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार (डॉलर) की भारी बचत होगी। इसके अलावा, कच्चे तेल (Crude Oil) और उर्वरकों के आयात में डॉलर की विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को सुरक्षा मिलेगी। यह कदम ‘रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण’ (Internationalization of Rupee) के भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लक्ष्य को भी एक नई गति प्रदान करेगा।

वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव
ब्रिक्स संगठन अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है; मिस्र, ईरान, यूएई, सऊदी अरब और इथियोपिया के शामिल होने से यह वैश्विक जीडीपी और तेल उत्पादन का एक बहुत बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है। जब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक और उपभोक्ता देश डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करेंगे, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक नया ‘बहुध्रुवीय’ (Multipolar) आर्थिक ढांचा आकार लेगा।

ब्रिक्स वित्त मंत्रियों की यह सहमति रातों-रात डॉलर को वैश्विक मंच से नहीं हटा सकती, क्योंकि आज भी दुनिया का अधिकांश व्यापार डॉलर में ही होता है। हालांकि, इसने डॉलर के एकाधिकार को एक गंभीर सैद्धांतिक चुनौती अवश्य दे दी है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) अब पश्चिमी देशों की आर्थिक शर्तों पर चलने के बजाय अपना स्वतंत्र आर्थिक मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

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