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केरल में 10 साल बाद सत्ता परिवर्तन: यूडीएफ (UDF) की शानदार वापसी, 140 में से 102 सीटें जीतकर वामपंथियों को किया बेदखल

तिरुवनंतपुरम (इलेक्शन डेस्क): दक्षिण भारत के अहम राज्य केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां की जनता लोकतांत्रिक बदलाव और जवाबदेही में गहरा विश्वास रखती है। 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने एक ऐतिहासिक और शानदार वापसी करते हुए राज्य में 10 साल बाद सत्ता परिवर्तन कर दिया है। यूडीएफ ने 140 सीटों वाली केरल विधानसभा में 102 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्तारूढ़ वामपंथी गठबंधन (LDF) को बुरी तरह से बेदखल कर दिया है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली मजबूत मानी जाने वाली वामपंथी सरकार का यह पतन राज्य की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है।

दशक भर बाद पुरानी परंपरा की हुई वापसी
केरल के राजनीतिक इतिहास में आम तौर पर हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन (यूडीएफ और एलडीएफ के बीच) की एक बेहद मजबूत परंपरा रही है। हालांकि, 2021 के विधानसभा चुनावों में पिनाराई विजयन ने कोविड-19 प्रबंधन और कल्याणकारी योजनाओं के दम पर इस ‘स्विंग’ परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर इतिहास रचा था। लेकिन 2026 के इस चुनाव में केरल की जनता ने उस पुरानी परंपरा को और भी अधिक आक्रामकता के साथ वापस ला दिया है। एलडीएफ का जादुई आंकड़े से मीलों दूर रह जाना और कुछ दर्जन सीटों पर सिमट जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जमीनी स्तर पर वामपंथी सरकार के खिलाफ भारी सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) चल रही थी।

पिनाराई विजयन सरकार की करारी हार के मुख्य कारण
राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, एलडीएफ की इस करारी शिकस्त के पीछे कई गंभीर कारण रहे हैं। पिछले पांच सालों में राज्य को एक गहरे आर्थिक संकट (Economic Crisis) का सामना करना पड़ा है। सरकार पर बढ़ते कर्ज, सरकारी खजाने के कुप्रबंधन और राज्य कर्मचारियों के वेतन-पेंशन भत्तों में देरी ने मध्यम वर्ग को खासा नाराज किया। इसके अतिरिक्त, शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और निवेश की कमी ने सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया। विपक्ष द्वारा लगाए गए भाई-भतीजावाद और नौकरशाही के हावी होने के आरोपों ने भी जनता के भीतर गहरे असंतोष को जन्म दिया, जिसका सीधा खामियाजा एलडीएफ को ईवीएम (EVM) पर उठाना पड़ा।

यूडीएफ की अचूक रणनीति और नई ऊर्जा
दूसरी ओर, कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने इस बार चुनाव में एक बेहद सधी हुई, एकजुट और आक्रामक रणनीति अपनाई। अपनी पुरानी गुटबाजी को दरकिनार करते हुए पार्टी ने एक स्पष्ट विजन के साथ चुनाव लड़ा। सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि इस बार यूडीएफ ने कई पुराने चेहरों की जगह युवाओं, पेशेवरों और महिलाओं पर दांव लगाया था। राहुल गांधी (जिनका केरल के वायनाड से गहरा नाता रहा है) और प्रियंका गांधी के तूफानी चुनाव प्रचार ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी। यूडीएफ ने राज्य की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने, आईटी सेक्टर में रोजगार सृजन और पारदर्शी शासन का जो ‘मेनिफेस्टो’ पेश किया, वह मतदाताओं की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरा।

राष्ट्रीय राजनीति के लिए इस जीत के मायने
राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष कर रही कांग्रेस पार्टी के लिए केरल की यह भारी-भरकम जीत किसी बड़ी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। दक्षिण भारत में अपनी जड़ें मजबूत करने के कांग्रेस के अभियान को इससे बहुत बड़ी ताकत मिली है। यह जीत राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी राजनीति को एक नई दिशा और रणनीतिक ऊर्जा प्रदान करेगी।

फिलहाल, तिरुवनंतपुरम स्थित कांग्रेस मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ में जबरदस्त जश्न का माहौल है। वहीं, वामपंथी खेमे (एकेजी सेंटर) में भारी सन्नाटा है और हार के कारणों पर गहन आत्ममंथन शुरू हो गया है। अब पूरे राज्य की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस आलाकमान केरल के नए मुख्यमंत्री के रूप में किस नेता के सिर पर ताज सजाता है।

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