होर्मुज जलडमरूमध्य: एक सुलगता ‘टाइम बम’, क्या ईरान के भूले हुए माइन्स बनेंगे दुनिया का काल?

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। ग्लोबल इकॉनमी की सांसें इसी रास्ते से होकर गुजरती हैं, क्योंकि दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल इसी संकरे जलमार्ग से होकर जाता है। लेकिन आज यह नीला समंदर एक खौफनाक रहस्य और अदृश्य मौत को अपने सीने में छिपाए हुए है। विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों के बीच यह चर्चा का विषय है कि ईरान ने इस क्षेत्र में जो भयानक ‘नेवल माइन्स’ (समुद्री बारूदी सुरंगें) बिछाई थीं, वह खुद उनकी सटीक लोकेशन भूल चुका है।
अगर यह सच है, तो इसका सीधा मतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब हमेशा के लिए एक खतरनाक और जानलेवा इलाका बन चुका है।
यह स्थिति इतनी घातक क्यों है?
समुद्री माइन्स (Naval Mines) जमीनी बारूदी सुरंगों से बिल्कुल अलग और कई गुना ज्यादा खतरनाक होते हैं। ईरान की यह कथित भूल पूरी दुनिया के लिए एक दुःस्वप्न इसलिए है:
* अदृश्य और तैरती हुई मौत: नेवल माइन्स को अमूमन जंजीरों के सहारे समुद्र तल से बांधा जाता है। लेकिन समय के साथ खारे पानी से जंजीरें जंग खाकर टूट जाती हैं। इसके बाद ये बारूदी सुरंगें (Mines) समुद्री लहरों के साथ बहने लगती हैं। जिस माइन को कल किसी किनारे पर बिछाया गया था, वह आज समंदर के बीचों-बीच किसी विशाल ऑयल टैंकर से टकराने के लिए तैयार हो सकती है।
* ग्लोबल इकॉनमी का पतन: अगर कोई भी कमर्शियल जहाज या ऑयल टैंकर इन माइन्स का शिकार होता है, तो होर्मुज का रास्ता बंद हो सकता है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा आग लग जाएगी, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई और आर्थिक संकट आ जाएगा।
* तकनीक का फेल होना: जो माइन्स दशकों पहले बिछाए गए थे, उन्हें ट्रैक करना आज के आधुनिक रडार और सोनार के लिए भी बेहद मुश्किल है क्योंकि उनके अंदर कोई इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल नहीं होता।
इतिहास के पन्नों से: जब समंदर से कभी नहीं हटे माइन
यह पहली बार नहीं है जब समंदर में बिछाए गए माइन्स हमेशा के लिए नासूर बन गए हों। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी युद्ध में समंदर को माइनफील्ड बनाया गया, इंसान उन्हें 100% कभी साफ नहीं कर पाया:
1. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (उत्तरी सागर और बाल्टिक सागर): विश्व युद्धों के दौरान ब्रिटेन, जर्मनी और रूस ने उत्तरी सागर (North Sea) और बाल्टिक सागर में लाखों की संख्या में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाई थीं। युद्ध तो खत्म हो गया, लेकिन आज 80-100 साल बाद भी इन सागरों में हजारों जिंदा माइन्स मौजूद हैं। आज भी कभी-कभी मछुआरों के जाल में या रिसर्च जहाजों को ये द्वितीय विश्व युद्ध के बम मिल जाते हैं, जो आज भी फटने की ताकत रखते हैं।
2. ईरान-इराक ‘टैंकर वॉर’ (1980 का दशक): 1980 के दशक में ईरान और इराक के बीच चले युद्ध के दौरान फारस की खाड़ी में अंधाधुंध माइन्स बिछाए गए थे। 14 अप्रैल 1988 को अमेरिकी नौसेना का एक युद्धपोत ‘USS Samuel B. Roberts’ ऐसे ही एक अनियंत्रित और पुराने ईरानी माइन से टकरा गया था। इस धमाके ने जहाज के दो टुकड़े कर दिए थे। इस घटना ने साबित कर दिया था कि समंदर में फेंका गया एक अंधा बम कितनी तबाही मचा सकता है।
3. काला सागर (Black Sea) का वर्तमान संकट: हाल ही में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी काले सागर में सैकड़ों माइन्स बिछाए गए हैं, जो अपनी जंजीरें तोड़कर तुर्की और रोमानिया के तटों तक बहकर आ रहे हैं और हमेशा के लिए एक खतरा बन गए हैं।
निष्कर्ष
समंदर कभी कुछ नहीं भूलता, भले ही इंसान भूल जाए। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में बिछाए गए और भुला दिए गए ये माइन्स अब किसी एक देश की सीमा या युद्ध का हिस्सा नहीं रहे हैं। ये अब एक ऐसा ‘ग्लोबल रशियन रूलेट’ (Russian Roulette) बन चुके हैं, जहां हर गुजरने वाले जहाज की किस्मत दांव पर लगी होती है। जब तक इन अनियंत्रित माइन्स को ढूंढकर नष्ट करने की कोई अचूक तकनीक विकसित नहीं होती, तब तक होर्मुज का यह जलमार्ग दुनिया के लिए हमेशा एक सुलगता हुआ टाइम बम बना रहेगा।



