‘हमें रिव्यू करने का अधिकार’, सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सती प्रथा का जिक्र किया

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें कोर्ट ने धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की जांच का अधिकार होने का संकेत दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा समाज और समाज के नैतिक मूल्यों को झकझोरती है, तो उसकी समीक्षा का अधिकार केवल अदालत को है, न कि केवल संसद का। इस टिप्पणी में कोर्ट ने सती प्रथा जैसे उदाहरण भी दिए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वह धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा करने का अधिकार रखता है।
सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच, जिसकी अगुवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे थे, ने कहा कि अदालत यह तय कर सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। इस पर निर्णय लेने के बाद, उस पर आगे क्या कदम उठाना है, यह संसद का कार्य हो सकता है। लेकिन, अदालत के अधिकार को खारिज नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी उस समय आई जब सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर बहस चल रही थी, जो महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का मामला है।
कोर्ट ने अपने तर्क को समझाने के लिए सती प्रथा, जादू-टोना, नरभक्षण जैसे उदाहरण भी दिए। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई प्रथा समाज को झकझोरती है या उससे समाज का नैतिक ढांचा प्रभावित होता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत को धार्मिक ज्ञान का अनुभव नहीं होता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारत में अलग-अलग राज्यों और समुदायों की मान्यताएं भिन्न हैं, इसलिए जो एक स्थान पर धार्मिक माना जाता है, वहीं दूसरे स्थान पर उसे अंधविश्वास माना जा सकता है।
जवाब में जजों ने पूछा कि यदि कोई प्रथा जैसे जादू-टोना को धर्म का हिस्सा माना जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा?
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यदि किसी मामले में कानून मौजूद नहीं है, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती? उन्होंने कहा कि कोर्ट सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर ऐसे मामलों में कदम उठा सकती है। तुषार मेहता ने भी माना कि अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन केवल अंधविश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मानदंडों के अनुसार।
जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा कि सरकार यह नहीं कह सकती कि अदालत के पास इस मामले में कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई प्रथा जैसे सती प्रथा या जादू-टोना बहुत ही गलत हो, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अदालत को यह भी देखना होगा कि कोई प्रथा उस धर्म के लिए ‘जरूरी’ है या नहीं। यह मूल्यांकन धर्म की परंपरा और सोच पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई प्रथा जरूरी है या नहीं, लेकिन यह सब समाज और नैतिकता के दायरे में ही होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने भी माना कि अदालत धार्मिक विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन यदि कोई प्रथा बहुत ही खतरनाक या गलत लगे, जैसे नरबलि या जादू-टोना, तो उस पर तुरंत निर्णय लेना चाहिए।
सरकार ने तर्क दिया कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक भेदभाव नहीं है, बल्कि यह भगवान अयप्पा की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, और इस परंपरा का सम्मान जरूरी है। सरकार ने कहा कि हर धार्मिक परंपरा को व्यक्तिगत अधिकार या समानता के नजरिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि हर धर्म की मान्यताओं का सम्मान होना चाहिए।



