श्रीगुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश पर्व: क्यों कहते हैं उन्हें हिन्द की चादर

( विवेक ओझा): सिख धर्म के नौवें गुरु ‘हिंद दी चादर’ गुरु तेग बहादुर जी के प्रकाश पर्व पर आज देश उनकी शहादत और शौर्य का स्मरण नमन कर रहा है। धर्म, मानवीय मूल्यों और स्वतंत्रता की रक्षा हेतु दिया गया उनका सर्वोच्च बलिदान विश्व इतिहास में अद्वितीय है। उनके आदर्श और सिद्धांत आज भी समस्त मानवता को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। श्रीगुरु तेग बहादुर जी 9वें सिख गुरु थे, जो अपनी शिक्षाओं, बहादुरी और शहादत के लिये सदैव पूजनीय थे और रहेंगे। वर्ष 1675 में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और जबरन धर्मांतरण के खिलाफ उनके रुख के लिये मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर उन्हें दिल्ली में फाँसी दे दी गई थी। इस सर्वोच्च बलिदान के कारण उन्हें ‘हिंद की चादर’ या ‘भारत की ढाल’ की शाश्वत उपाधि मिली।
श्रीगुरु तेग बहादुर जी जैसे व्यक्तित्व, इतिहास में विरले ही होते हैं। उनका जीवन, उनका त्याग, उनका चरित्र बहुत बड़ी प्रेरणा है। मुगल आक्रांताओं के उस काल में, गुरु साहिब ने वीरता का आदर्श स्थापित किया। हम सब जानते हैं कि, श्रीगुरू तेग बहादुर जी के शहीद होने से पहले क्या हुआ था। मुगल आक्रांताओं के उस काल में कश्मीरी हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण किया जा रहा था। इस संकट के बीच पीड़ितों के एक दल ने गुरु साहिब से सहयोग मांगा। तब श्रीगुरु साहिब ने उन पीड़ितों को जवाब दिया था, कि आप सब औरंगज़ेब को साफ-साफ कह दें, यदि श्रीगुरु तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार कर लें, तो हम सब इस्लाम धर्म अपना लेंगे।
इन वाक्यों में श्रीगुरू तेग बहादुर जी की निडरता, उसकी पराकाष्ठा थी। इसके बाद जिसकी आशंका थी, वही हुआ। उस क्रूर औरंगजेब ने गुरु साहिब को बंदी बनाने का आदेश दिया, लेकिन गुरु साहिब ने खुद, दिल्ली जाने की घोषणा कर दी। मुगल शासकों ने, उन्हें प्रलोभन भी दिये, लेकिन श्रीगुरू तेग बहादुर अडिग रहे, उन्होंने धर्म और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। और इसीलिए, उनका मन तोड़ने के लिए, गुरु साहिब को पथ से डिगाने के लिए, उनके सामने, उनके तीन साथियों- भाई दयाला जी, भाई सती दास जी, भाई मती दास जी की निर्ममता से हत्या की गयी| लेकिन गुरु साहिब अटल रहे, उनका संकल्प अटल रहा। उन्होंने धर्म का रास्ता नहीं छोड़ा, तप की अवस्था में, गुरु साहिब ने अपना शीश धर्म की रक्षा को समर्पित कर दिया।
मुगल इतने पर ही नहीं रुके थे, उन्होंने गुरु महाराज के शीश को अपमानित करने का भी प्रयास किया, लेकिन भाई जैता जी ने, अपने पराक्रम के बल पर, उनके शीश को आनंदपुर साहिब पहुंचाया। इसलिए ही श्रीगुरु गोविंद सिंह जी ने लिखा है – “तिल्कजन्जू राखा प्रभ ता का,तेग बहादुर सी क्रिया, करी न किन्हुं आन। इसका अर्थ था कि, धर्म का तिलक सुरक्षित रहे, लोगों की आस्था पर अत्याचार न हो, इसके लिए गुरु साहिब ने सब कुछ न्योछावर कर दिया। गुरु तेग बहादुर ने बादशाह औरंगज़ेब को संबोधित करते हुए कहा, “मेरा धर्म भले ही हिंदू न हो, मैं भले ही वेदों की श्रेष्ठता, मूर्ति पूजा और दूसरे रीति रिवाजों में न यकीन करता हूँ, लेकिन मैं हिंदुओं के सम्मान से रहने और उनके धार्मिक अधिकारों के लिए लड़ता रहूँगा.”
गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद और माता नानकी के यहाँ हुआ था। उनके तपस्वी स्वभाव के कारण उनका मूल नाम त्याग मल रखा गया था। उन्होंने एक समग्र शिक्षा प्राप्त की, प्रसिद्ध भाई गुरदास से शास्त्रों में और बाबा बुद्ध से मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित हुये। गुरु के रूप में उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में 116 भजनों का योगदान दिया, सिख शिक्षाओं के प्रसार के लिये बड़े पैमाने पर यात्रा की तथा चक-नानकी शहर की स्थापना की, जो बाद में श्री आनंदपुर साहिब शहर के रूप में विकसित हुआ ।
गुरु तेग बहादुर का महत्व:
गुरु तेग बहादुर के जीवन और दर्शन की अमिट विरासत इस तथ्य में निहित है कि गुरु नानक के ‘ईश्वर की एकता’ ( इक ओंकार ) के संदेश को आगे बढ़ाते हुए, गुरु तेग बहादुर ने मानवता को सभी भयों से मुक्त ( निर्भय ) होने और सभी शत्रुताओं से अछूते ( निर्वैर ) रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने पिता (छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद) और अपने पुत्र (दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह) के बीच एक नैतिक और ऐतिहासिक कड़ी का काम किया। अपने पिता के निडर और साहसी स्वरूप का अनुसरण करते हुए, उन्होंने गुरु गोविंद सिंह को विरासत सौंपी और सिखों को एक नई एकता और पहचान प्रदान करने के लिए उन्हें एक मजबूत आधार प्रदान किया। गुरु तेग बहादुर के सर्वोच्च बलिदान ने खालसा की स्थापना की नींव रखी और इस प्रकार गुरु गोविंद सिंह ने गुरु नानक के मिशन पर कार्य करते हुए और अपने पिता द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करते हुए, गुरु नानक के सिखों को संत सैनिकों में परिवर्तित कर दिया, जो कट्टरता और असहिष्णुता के खिलाफ अंतरात्मा की रक्षा कर सकते थे, जो उस समय के शासक अधिकारियों की एक अनिवार्य विशेषता बन गई थी।



