Trending

चुनाव केवल वोटों का खेल, असली सम्मान जनसेवा से मिलता है: उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन

राघवेंद्र प्रताप सिंह/  नई दिल्ली: भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि चुनाव भले ही वोटों की गिनती से जीते जाते हों, लेकिन समाज में वास्तविक सम्मान केवल और केवल निस्वार्थ जनसेवा के माध्यम से ही अर्जित किया जा सकता है। उनका यह बयान उन तमाम जनप्रतिनिधियों और युवा नेताओं के लिए एक बड़ा संदेश है, जो सार्वजनिक जीवन को केवल सत्ता और पद हासिल करने का साधन मानते हैं।

सत्ता और सम्मान के बीच का वास्तविक अंतर

एक हालिया सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने लोकतंत्र में चुनावों के महत्व और जनप्रतिनिधियों की वास्तविक भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव जीतना एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें संख्या बल (वोट) महत्वपूर्ण होता है। एक व्यक्ति अपनी राजनीतिक रणनीतियों, समीकरणों या घोषणाओं के आधार पर चुनाव जीतकर किसी बड़े पद तक पहुंच सकता है। लेकिन, सत्ता मिल जाना इस बात की गारंटी बिल्कुल नहीं है कि उस व्यक्ति को जनता का सच्चा सम्मान भी मिल गया है।

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि, “कुर्सी और पद से आपको प्रशासनिक अधिकार मिल सकते हैं, लेकिन लोगों के दिलों में आदर और सम्मान आपके कर्मों, आपकी ईमानदारी और जनता के प्रति आपके समर्पण से ही मिलता है।”

निस्वार्थ सेवा ही है सच्ची विरासत

सी.पी. राधाकृष्णन ने इतिहास के कई महान नेताओं का उदाहरण देते हुए श्रोताओं को याद दिलाया कि दुनिया हमेशा उन्हीं लोगों को सम्मान के साथ याद रखती है जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने कहा, “जब आप किसी बड़े पद पर नहीं रहते हैं, तब आपके द्वारा बनाए गए राजनीतिक समीकरण या आपकी चुनावी जीतें याद नहीं रखी जाती हैं। इतिहास केवल यह याद रखता है कि आपने कितनों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया और संकट के समय आप जनता के साथ कितनी मजबूती से खड़े रहे।” उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से अपील की कि वे अपने पद का उपयोग व्यक्तिगत लाभ या अहंकार को पोषित करने के बजाय जनकल्याणकारी कार्यों में करें।

युवाओं और भावी नेताओं को कड़ा संदेश

अपने इस ओजस्वी संबोधन के दौरान उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से देश के युवाओं और राजनीति में कदम रखने वाले नए लोगों को भी एक बड़ी सीख दी। उन्होंने आह्वान किया कि युवा पीढ़ी को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते समय केवल सत्ता प्राप्ति को अपना अंतिम लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। इसके बजाय, उन्हें समाज की सेवा करने, गरीबों और बेसहारों की आवाज बनने तथा राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने के संकल्प के साथ आगे आना चाहिए।

जनसेवा का मार्ग कठिन जरूर हो सकता है, लेकिन इससे मिलने वाला आत्मसंतोष और सामाजिक सम्मान किसी भी बड़ी से बड़ी चुनावी जीत से कहीं अधिक मूल्यवान और स्थायी होता है।

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन का यह वक्तव्य आज के उस दौर में बेहद प्रासंगिक है, जहां अक्सर राजनीति को केवल वोट बैंक और सत्ता हथियाने की एक अंधी दौड़ के रूप में देखा जाता है। उनका यह स्पष्ट संदेश भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता तथा सेवा भाव को फिर से स्थापित करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक कदम है।

Related Articles

Back to top button