वैश्विक ऊर्जा संकट: अमेरिका का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व 5.5 मिलियन बैरल गिरा, 1983 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा

विवेक ओझा/ वॉशिंगटन/नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार और कच्चे तेल की आपूर्तियों को लेकर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका का रणनीतिक तेल भंडार यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve – SPR) इस सप्ताह 5.5 मिलियन बैरल और गिर गया है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस भारी गिरावट के बाद अमेरिका का सुरक्षित आपातकालीन तेल भंडार अब साल 1983 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस गिरावट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
क्यों खाली हो रहा है अमेरिका का आपातकालीन तेल भंडार?
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका द्वारा अपने रणनीतिक भंडार से लगातार तेल निकालने के पीछे घरेलू बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना और मुद्रास्फीति (Inflation) पर काबू पाना है। वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और प्रमुख तेल उत्पादक देशों (OPEC+) द्वारा उत्पादन में की जा रही कटौती के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार दबाव में हैं। अमेरिकी प्रशासन ने घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से आम जनता को राहत देने के लिए आपातकालीन भंडार से बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाने का फैसला किया था, जिसका सीधा असर अब इस रिजर्व के स्तर पर दिख रहा है।
1983 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट के मायने
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार किसी भी देश के लिए युद्ध, प्राकृतिक आपदा या किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट के समय ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा जरिया होता है। अमेरिका का SPR अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंचने का मतलब है कि भविष्य में किसी बड़े वैश्विक संकट या खाड़ी देशों में तनाव बढ़ने की स्थिति में अमेरिका के पास आपातकालीन मुकाबला करने की क्षमता सीमित हो जाएगी।
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका ने जल्द ही इस भंडार को फिर से भरने (Refill) की प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सट्टेबाजी और कीमतें बेलगाम हो सकती हैं।
वैश्विक और भारतीय बाजार पर संभावित असर
कच्चे तेल के इस रणनीतिक संकट का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। भारत जैसे विकासशील देश, जो अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है।
कच्चे तेल में उछाल की आशंका: यदि अमेरिका अपने भंडार को दोबारा भरने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से भारी मात्रा में तेल खरीदना शुरू करता है, तो मांग बढ़ने से ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें एक बार फिर $90 से $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
रुपये और घरेलू बाजार पर दबाव: भारत के लिए कच्चा तेल महंगा होने का सीधा मतलब है देश के आयात बिल में बढ़ोतरी, जिससे भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है और घरेलू बाजार में भी ईंधन की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।
अमेरिकी प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
वर्तमान में अमेरिकी प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह घरेलू बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए रिजर्व से और तेल निकाले या अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इसे फिर से भरना शुरू करे। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के बीच इस मुद्दे पर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है, जहाँ विपक्षी दल सरकार पर देश की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता करने का आरोप लगा रहे हैं।

