ऐतिहासिक उपलब्धि या महज आंकड़े? नीति आयोग की नई रिपोर्ट का बड़ा दावा- पिछले एक दशक में 20 करोड़ भारतीय आए बहुआयामी गरीबी से बाहर

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली | भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास के इतिहास में आज एक बेहद अहम अध्याय जुड़ गया है। गरीबी, जिसे दशकों से भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता रहा है, उस मोर्चे पर एक बड़ी और आधिकारिक खुशखबरी सामने आई है। सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग (NITI Aayog) ने आज अपनी नवीनतम ‘राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) 2026’ रिपोर्ट जारी कर दी है। इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला दावा यह है कि पिछले एक दशक (लगभग 10 वर्षों) में भारत के 20 करोड़ से अधिक लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) के चंगुल से हमेशा के लिए बाहर निकल आए हैं।
यह आंकड़ा कोई साधारण उपलब्धि नहीं है; 20 करोड़ की आबादी दुनिया के कई बड़े यूरोपीय देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। लेकिन सवाल यह है कि यह चमत्कार कैसे हुआ और इसके असल मायने क्या हैं?
क्या है ‘बहुआयामी गरीबी’ का पैमाना?
इस रिपोर्ट को गहराई से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि नीति आयोग की यह रिपोर्ट केवल आय (Income) के आधार पर गरीबी नहीं मापती। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) मुख्य रूप से तीन बड़े आयामों—स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर (Standard of Living) पर आधारित है।
इन तीन आयामों को 12 विशिष्ट संकेतकों (Indicators) में बांटा गया है, जिनमें पोषण, बाल और किशोर मृत्यु दर, मातृ स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा के वर्ष, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने का ईंधन (LPG), स्वच्छता (शौचालय), पीने का पानी, बिजली, आवास और बैंक खाते शामिल हैं। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जब कोई परिवार इन बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहता है, तभी वह बहुआयामी गरीबी में गिना जाता है।
20 करोड़ लोगों के जीवन में कैसे आया बदलाव?
नीति आयोग के सीईओ द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस ऐतिहासिक कमी के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की लक्षित (Targeted) कल्याणकारी योजनाओं का सबसे बड़ा हाथ है।
* उज्ज्वला योजना (Ujjwala Yojana): महिलाओं को लकड़ी के धुएं से मुक्ति दिलाकर क्लीन कुकिंग फ्यूल देना।
* स्वच्छ भारत मिशन (Swachh Bharat Mission): गांव-गांव में करोड़ों शौचालयों का निर्माण, जिसने स्वच्छता के मानक को सुधारा।
* जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission): हर घर तक नल से साफ पीने का पानी पहुंचाना, जिससे जलजनित बीमारियों में भारी कमी आई।
* पीएम आवास योजना और आयुष्मान भारत: पक्के मकानों का निर्माण और 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज ने गरीबों को अचानक आने वाले आर्थिक संकटों से बचाया।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में, जिन्हें कभी ‘बीमारू’ (BIMARU) राज्य कहा जाता था, गरीबी में सबसे तेज और आनुपातिक गिरावट दर्ज की गई है।
आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत
एक आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर अगर इस रिपोर्ट का मूल्यांकन किया जाए, तो यह निश्चित रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ और भारत के नीति-निर्माताओं के लिए एक बहुत बड़ी सफलता है। वैश्विक मंचों (जैसे UN और World Bank) पर भारत की छवि अब एक ‘गरीब देश’ से ‘तेजी से उभरती महाशक्ति’ में बदल रही है।
हालांकि, जश्न के इस माहौल के बीच हमें कुछ कड़वी सच्चाइयों का भी सामना करना होगा। ‘बहुआयामी गरीबी’ से बाहर आने का सीधा अर्थ यह है कि एक नागरिक को जीने के लिए छत, शौचालय, पानी और बिजली मिल गई है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि वह आर्थिक रूप से सुरक्षित (Financially Secure) हो गया है? बिल्कुल नहीं।
आज भी एक बड़ी आबादी ऐसी है जो गरीबी रेखा के ठीक ऊपर (‘Vulnerable Class’) खड़ी है। थोड़ी सी भी भयंकर महंगाई, बेरोजगारी या कोई स्वास्थ्य आपदा (जैसे महामारी) इन्हें वापस गरीबी के गर्त में धकेल सकती है। 20 करोड़ लोगों का बुनियादी जरूरतों से लैस होना पहला कदम है, लेकिन अगला और सबसे कठिन कदम है—उन्हें गुणवत्तापूर्ण रोजगार (Quality Employment), बेहतर आय और महंगाई से सुरक्षा देना।
नीति आयोग की यह रिपोर्ट भारत के ‘विकसित भारत @2047’ के सपने की एक मजबूत नींव जरूर है, लेकिन असली चुनौती अब ‘सर्वाइवल’ (Survival) से आगे बढ़कर आम आदमी को ‘समृद्धि’ (Prosperity) तक पहुंचाने की है। जब तक रोजगार के मोर्चे पर ठोस परिणाम नहीं आते, तब तक केवल आंकड़ों के सहारे एक संपूर्ण विकसित अर्थव्यस्था का निर्माण नहीं किया जा सकता।



