ओमान के तट पर मौत से सीधा मुकाबला
अमेरिकी मिसाइल हमले के बीच फंसे भारतीय नाविकों का सफल रेस्क्यू, खाड़ी में बढ़ते तनाव का खौफनाक मंजर

नई दिल्ली/विवेक ओझा | समुद्र की शांत दिखने वाली लहरें कब भू-राजनीतिक युद्ध के शोलों में तब्दील हो जाएं, इसका सबसे खौफनाक मंजर हाल ही में ओमान के तट पर देखने को मिला। मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही भयंकर सैन्य तनातनी का खामियाजा उन निर्दोष भारतीय नाविकों को भुगतना पड़ा, जो उस क्षेत्र से गुजर रहे एक मर्चेंट नेवी जहाज पर तैनात थे। ओमान के तट के करीब हुए एक भीषण अमेरिकी मिसाइल हमले के बाद इन नाविकों का जहाज खतरनाक क्रॉसफायर के बीच फंस गया था। हालांकि, कूटनीतिक और नौसैन्य फुर्ती के कारण इन भारतीय नाविकों के समूह को सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर लिया गया है, जिससे देश भर में और उनके परिवारों में राहत की सांस ली गई है।
मौत के साये में चंद घंटे: क्या हुआ था ओमान तट पर?
जब दो महाशक्तियां टकराती हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी का होता है। अमेरिका द्वारा ईरान-समर्थित ठिकानों पर किए गए जवाबी मिसाइल हमले के दौरान, यह कमर्शियल जहाज उस ‘रेड ज़ोन’ के बेहद करीब था। मिसाइलों की गड़गड़ाहट और हवा में उड़ते मलबे के बीच इन नाविकों ने जो दहशत के घंटे बिताए, वह किसी भी बुरे सपने से बदतर था। घटना की सूचना मिलते ही भारत के विदेश मंत्रालय और भारतीय नौसेना ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर एक जटिल रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम दिया।
भारत की कूटनीतिक और नौसैन्य ताकत का प्रदर्शन
यह सफल बचाव अभियान भारत की उस बढ़ती हुई सामरिक और कूटनीतिक हैसियत का भी प्रमाण है, जहाँ वह संकटग्रस्त इलाकों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने (Evacuation) में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है। यमन, यूक्रेन, सूडान और अब ओमान के तट से भारतीयों की सुरक्षित वापसी यह बताती है कि भारत का ‘क्राइसिस मैनेजमेंट रेस्पॉन्स’ कितना धारदार हो चुका है।
नाविकों का घर लौटना सुखद है, लेकिन यह घटना एक खतरनाक खतरे की घंटी है। विश्व व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) से होकर गुजरता है और हजारों भारतीय नाविक इस ग्लोबल सप्लाई चेन की रीढ़ हैं। मध्य पूर्व में भड़कती युद्ध की यह आग भारत की ऊर्जा सुरक्षा और उसके डायस्पोरा के लिए एक सीधा खतरा है। भारत को आने वाले समय में अपने समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए अपनी नौसैन्य उपस्थिति और कूटनीतिक दखल को और भी ज्यादा आक्रामक रूप से मजबूत करना होगा।



