अमेरिकन ड्रीम’ को संजीवनी: अमेरिकी जज ने H-1B वीजा फीस में भारी वृद्धि के फैसले को पलटा
भारतीय IT पेशेवरों और कंपनियों को मिली बड़ी राहत

वॉशिंगटन/नई दिल्ली /विवेक ओझा| सिलिकॉन वैली से लेकर बेंगलुरु के टेक पार्कों तक आज राहत की लहर है। भारतीय आईटी पेशेवरों और टेक कंपनियों के ‘अमेरिकन ड्रीम’ पर लटक रही एक बेहद भारी और महंगी तलवार आखिरकार हटा ली गई है। अमेरिका के एक फेडरल जज ने एक ऐतिहासिक फैसले में H-1B वीजा फीस में की गई भारी और विवादास्पद वृद्धि को पलट दिया है। यह फैसला न केवल उन हजारों भारतीय युवाओं के लिए एक संजीवनी है जो अमेरिका में अपने करियर के सपने बुन रहे हैं, बल्कि TCS, Infosys और Wipro जैसी दिग्गज भारतीय आईटी कंपनियों के लिए भी एक बड़ी जीत है, जिन पर इस फीस वृद्धि से करोड़ों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला था।
क्या था यह विवाद और क्यों हुआ था विरोध?
अमेरिकी आव्रजन एजेंसी (USCIS) ने कुछ समय पहले H-1B वीजा आवेदन की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी का फरमान सुनाया था। कई श्रेणियों में तो यह वृद्धि 70% से लेकर 200% तक थी। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि एजेंसी के वित्तीय घाटे को पाटने के लिए यह जरूरी है। लेकिन भारतीय और अमेरिकी टेक कंपनियों ने इसे ‘प्रतिभाओं पर टैक्स’ (Tax on Talent) करार देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि इस मनमानी फीस वृद्धि से अमेरिका का इनोवेशन इकोसिस्टम बर्बाद हो जाएगा, क्योंकि यहां की टेक इंडस्ट्री काफी हद तक भारतीय प्रतिभाओं पर निर्भर है।
जज का फैसला: मनमानी पर लगाम
मामले की सुनवाई करते हुए अमेरिकी अदालत ने स्पष्ट किया कि USCIS द्वारा लागू की गई यह फीस वृद्धि तार्किक नहीं थी और इसे लागू करने की प्रक्रिया में कानूनी खामियां थीं। अदालत ने माना कि इमिग्रेशन सेवाओं की आड़ में कंपनियों और पेशेवर प्रवासियों पर बेवजह का वित्तीय बोझ डालना अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह फैसला साबित करता है कि अमेरिकी तकनीक का पहिया भारतीय इंजीनियरों के बिना नहीं घूम सकता। हालांकि यह फैसला एक फौरी राहत है, लेकिन यह भारतीय आईटी सेक्टर को एक कड़ा संदेश भी देता है—भविष्य में अमेरिकी नीतियों के भरोसे रहने के बजाय, भारत को खुद को एक ऐसा ‘इनोवेशन हब’ बनाना होगा जहाँ ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के बजाय दुनिया भर की प्रतिभाएं भारत आकर काम करना चाहें।



