दिल्ली के बंद कमरे से निकला ‘मिशन 2026’ का ब्लूप्रिंट
23 विपक्षी दलों की महाबैठक में ममता की एंट्री, पर आंतरिक अंतर्विरोधों की चुनौती बरक़रार

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली | राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में आज सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर थीं। एक तरफ जहाँ सत्ता पक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित पीएम बनने का जश्न मना रहा था, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के एक बंद कमरे में भाजपा के इस अजेय चुनावी रथ की रफ्तार को थामने के लिए आज़ाद भारत की सबसे बड़ी विपक्षी घेराबंदी की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी। सत्ताधारी दल के एकछत्र वर्चस्व को चुनौती देने और देश के राजनीतिक विमर्श को बदलने के संकल्प के साथ ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन की एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील बैठक संपन्न हुई, जिसमें तृणमूल कांग्रेस (TMC) समेत देश भर के 23 प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं ने हिस्सा लिया।
ममता की मौजूदगी और गठबंधन का नया पावर सेंटर
इस बैठक की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली सुर्खी बनी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की उपस्थिति। पिछले कुछ महीनों से गठबंधन की बैठकों से दूरी बनाने और क्षेत्रीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र राह पकड़ने वाली ममता बनर्जी का इस बैठक में शामिल होना यह साफ संकेत देता है कि विपक्ष अब इस बात को समझ चुका है कि अगर इस बार वे बिखर गए, तो उनका राजनीतिक अस्तित्व हमेशा के लिए दांव पर लग जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक, बंद कमरे में हुई इस बातचीत का मुख्य एजेंडा आगामी राज्यों के चुनावों और राष्ट्रीय मुद्दों पर एक ‘साझा न्यूनतम कार्यक्रम’ (Common Minimum Programme) तैयार करना था। विपक्ष अब यह मान चुका है कि केवल टीवी स्टूडियो या सोशल मीडिया पर मोदी सरकार का विरोध करके चुनाव नहीं जीते जा सकते; इसके लिए ज़मीन पर एक ऐसा विकल्प देना होगा जो सीधे जनता के सरोकारों से जुड़ता हो।
एकता के दावों के बीच अंतर्विरोधों की कड़वी सच्चाई
हालांकि, इस बैठक की जो तस्वीरें बाहर आईं, वे जितनी खुशनुमा थीं, गठबंधन के भीतर की हकीकत उतनी ही पेचीदा है। एकजुटता के इस बड़े शक्ति प्रदर्शन के बीच कुछ ऐसी दरारें भी दिखीं जिन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन है:
डीएमके का बहिष्कर: तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके ने इस महत्वपूर्ण बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया। डीएमके का आरोप है कि कांग्रेस ने तमिलनाडु के स्थानीय निकाय मामलों और नीतिगत फैसलों में उनके साथ ‘विश्वासघात’ किया है।
आम आदमी पार्टी की दूरी: दिल्ली और पंजाब की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी इस बैठक से किनारा कर लिया, जो यह दिखाता है कि दिल्ली आर्डिनेंस और राज्यों में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और आप के बीच की कड़वाहट अभी कम नहीं हुई है।
केरल का त्रिकोण: केरल में सीपीएम और कांग्रेस के बीच जमीनी स्तर पर चल रहे खूनी संघर्ष और हालिया बयानों के बावजूद सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास बैठक में शामिल तो हुए, लेकिन उनके और कांग्रेस नेताओं के बीच की शारीरिक भाषा (Body Language) काफी ठंडी रही।
आगे की राह: अंकगणित बनाम केमिस्ट्री का इम्तिहान
एक राजनीतिक विश्लेषक के रूप में मेरा मानना है कि ‘इंडिया’ गठबंधन के लिए 23 दलों को एक मेज पर लाना तो आसान था, लेकिन असली चुनौती इस चुनावी अंकगणित को एक राजनीतिक ‘केमिस्ट्री’ में बदलने की है। विपक्ष के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि राज्यों में ये दल एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। बंगाल में जो टीएमसी कार्यकर्ता कांग्रेस से लड़ रहा है, या केरल में जो वामपंथी कार्यकर्ता कांग्रेस के खिलाफ खड़ा है, क्या वे राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का झंडा उठाने को तैयार होंगे?
ग्राउंड रिपोर्टिंग यही इशारा करती है कि विपक्ष ने दिल्ली में बैठकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने का इरादा तो जता दिया है, लेकिन उनका असली इम्तिहान तब होगा जब वे ‘वन-ऑन-वन’ (एक सीट पर विपक्ष का एक उम्मीदवार) के फॉर्मूले को जमीन पर उतारेंगे। अगर वे इस आंतरिक कलह को सुलझा पाए, तो भारत की राजनीति का अगला अध्याय बेहद दिलचस्प होगा; और अगर फेल हुए, तो यह बैठक महज़ एक और फोटो-ऑप बनकर रह जाएगी।