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सुप्रीम कोर्ट से ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) को बड़ी हरी झंडी

उत्तराखंड मॉडल पर लगी मुहर, राज्यों के अधिकारों पर स्थिति हुई साफ

नई दिल्ली (पल्लवी श्रीवास्तव): भारत के सामाजिक और कानूनी ढांचे को नई दिशा देने वाले एक युगांतरकारी फैसले में, देश के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) के मुद्दे पर एक बेहद स्पष्ट और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने उत्तराखंड राज्य में लागू किए गए ‘राज्य-स्तरीय समान नागरिक संहिता’ को चुनौती देने वाली सभी जनहित याचिकाओं (PILs) को सिरे से खारिज कर दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने इस लंबी कानूनी बहस पर पूर्ण विराम लगा दिया है कि राज्यों को UCC लागू करने का अधिकार है या नहीं। अदालत ने अपने फैसले में दो-टूक कहा है कि राज्य विधानसभाओं के पास इस विषय पर कानून बनाने का पूरा और वैध संवैधानिक अधिकार है।

क्या था विवाद और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी व्याख्या?
याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया था कि ‘व्यक्तिगत कानून’ (Personal Laws) जैसे विवाह, तलाक, और विरासत सीधे तौर पर नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) से जुड़े हैं। उनका दावा था कि एक राज्य अपने स्तर पर ऐसा कानून नहीं थोप सकता जो विभिन्न धर्मों के सदियों पुराने पर्सनल लॉ को खत्म करता हो।

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए इन तर्कों को नकार दिया। अदालत ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की ‘समवर्ती सूची’ (Concurrent List) की ‘प्रविष्टि 5’ के तहत विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे विषय शामिल हैं। समवर्ती सूची का अर्थ ही यह है कि इस पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं। इसके अतिरिक्त, संविधान का ‘अनुच्छेद 44’ (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) खुद यह अपेक्षा करता है कि राज्य सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड सरकार ने इसी संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है।

उत्तराखंड का UCC मॉडल: समानता और महिला सशक्तिकरण की ओर कदम
सुप्रीम कोर्ट की इस मुहर के बाद, उत्तराखंड का यह कानून अब पूरे देश के लिए एक ‘लीगल बेंचमार्क’ (कानूनी मानक) बन गया है। इस कानून के लागू होने से राज्य में सभी धर्मों और समुदायों के लिए नियम एक समान हो गए हैं। इस कानून की सबसे प्रमुख विशेषताएं महिलाओं के अधिकारों पर केंद्रित हैं। इसके तहत बहुविवाह (Polygamy), इद्दत और हलाला जैसी प्रथाओं पर पूरी तरह से कानूनी रोक लगा दी गई है। बेटे और बेटियों को पैतृक संपत्ति में पूर्ण रूप से समान अधिकार दिया गया है। इसके अलावा, लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित किया गया है, ताकि महिलाओं और बच्चों को सामाजिक और कानूनी सुरक्षा मिल सके।

देशभर की राजनीति पर पड़ेगा भारी असर (Ripple Effect)
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल उत्तराखंड की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। इसने पूरे देश की राजनीति में एक नई लहर पैदा कर दी है। कानूनी जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सर्वोच्च अदालत की इस ‘हरी झंडी’ के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित अन्य राज्य—जैसे असम, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश—भी अपने-अपने यहां UCC का मसौदा लागू करने की प्रक्रिया को तेज कर देंगे।

यह फैसला उन राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के लिए एक बड़ा हथियार बन गया है, जो ‘एक देश, एक कानून’ के नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, कई अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का अब भी यह मानना है कि यह विविधता (Diversity) के खिलाफ है, लेकिन शीर्ष अदालत के इस फैसले ने इस मुद्दे के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है। यह फैसला भारतीय समाज को एक धर्मनिरपेक्ष और लैंगिक समानता (Gender Equality) वाले आधुनिक ढांचे की ओर ले जाने वाला एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

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