संसद के मानसून सत्र का बिगुल बजा: 13 जुलाई से संग्राम
नए 'परिसीमन बिल' पर आर-पार के मूड में सरकार और विपक्ष

नई दिल्ली (पल्लवी श्रीवास्तव): देश के विधायी इतिहास में आगामी कुछ हफ्ते बेहद ऐतिहासिक और हंगामेदार साबित होने वाले हैं। संसदीय कार्य मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि संसद का बहुप्रतीक्षित मानसून सत्र आगामी 13 जुलाई 2026 से शुरू होने जा रहा है। यह सत्र केवल एक रूटीन विधायी कार्यसूची तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक गलियारों में इस बात की प्रबल सुगबुगाहट है कि केंद्र सरकार इस सत्र में देश का सियासी नक्शा बदलने वाला ‘नया परिसीमन विधेयक’ (New Delimitation Bill) पेश करने की पूरी तैयारी में है। इस बिल के ड्राफ्ट की खबर मात्र से ही विपक्ष ने लामबंदी शुरू कर दी है, जिससे सत्र के दौरान दोनों सदनों में भारी गतिरोध और हंगामे के पूरे आसार नजर आ रहे हैं।
परिसीमन बिल: आखिर क्यों सुलग रही है विवाद की चिंगारी?
एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर जब हम इस आगामी सत्र के एजेंडे को देखते हैं, तो परिसीमन बिल सबसे बड़ा ‘फ्लैशपॉइंट’ (टकराव का बिंदु) बनकर उभरता है। परिसीमन का सीधा मतलब है जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण (Delimitation) करना। दरअसल, भारत में लोकसभा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2026 तक के लिए फ्रीज (स्थिर) किया गया था। अब जब यह समय-सीमा समाप्त हो रही है, तो सरकार नई आबादी के आंकड़ों के अनुसार सीटों के पुनर्गठन की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
विवाद की असली वजह जनसांख्यिकीय असंतुलन (Demographic Imbalance) है। यदि विशुद्ध रूप से जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की लोकसभा सीटों में भारी उछाल आएगा। इसके विपरीत, दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) और पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व संसद में आनुपातिक रूप से कम हो जाएगा। इन दक्षिणी राज्यों ने पिछले दशकों में परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है, और अब उन्हें डर है कि इसी सफलता के कारण उनकी राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी।
विपक्ष की घेराबंदी: क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व दांव पर
‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के घटक दल, विशेषकर डीएमके (DMK), तृणमूल कांग्रेस (TMC), और वामपंथी दल इस बिल को लेकर सबसे ज्यादा आक्रामक हैं। विपक्ष का स्पष्ट तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण के अच्छे प्रदर्शन की सजा उनके राज्यों को नहीं मिलनी चाहिए। डीएमके और टीएमसी जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए यह उनके राजनीतिक रसूख और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी आवाज के अस्तित्व की लड़ाई है। विपक्ष का आरोप है कि इस कदम से ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ का एक खतरनाक विभाजन पैदा हो सकता है, जो देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।
13 जुलाई से शुरू हो रहे इस सत्र में विपक्ष केवल परिसीमन बिल ही नहीं, बल्कि कई अन्य मुद्दों पर भी सरकार को चौतरफा घेरने की रणनीति बना चुका है। इसमें हालिया प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता का संकट, महंगाई, बेरोजगारी और राज्यों के आर्थिक अधिकारों जैसे जमीनी मुद्दे शामिल हैं। विपक्ष की कोशिश होगी कि इस सत्र में सरकार को पूरी तरह से रक्षात्मक मुद्रा में लाया जाए।
सरकार का विजन और विधायी चुनौतियां
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का मानना है कि परिसीमन एक संवैधानिक बाध्यता है जिसे अब और लंबे समय तक नहीं टाला जा सकता। सरकार का तर्क है कि बढ़ती आबादी के साथ सांसदों के कार्यक्षेत्र का दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि प्रभावी विकास और सही लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए सीटों का विस्तार अपरिहार्य है। नई संसद भवन की 888 सीटों की क्षमता भी इसी भविष्य की जरूरतों को देखकर तैयार की गई है। सरकार इस बिल को पास कराने के लिए कुछ क्षेत्रीय दलों से भीतरखाने संपर्क भी साध रही है, ताकि संसद के भीतर संख्या बल को सुरक्षित किया जा सके।
मुख्य विश्लेषण: यह मानसून सत्र केवल सामान्य विधेयकों को पारित कराने का जरिया नहीं होगा, बल्कि यह नए भारत के राजनीतिक भूगोल (Political Geography) और देश की सत्ता के केंद्र की दिशा तय करेगा।
13 जुलाई से शुरू होने वाले इस सत्र में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार विपक्ष की चिंताओं को दूर करने के लिए कोई बीच का रास्ता या जनसांख्यिकीय सुरक्षा फॉर्मूला लेकर आती है, या फिर यह सत्र भारतीय संसद के इतिहास में विधायी संग्राम की एक नई इबारत लिखेगा।



