रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति की नई किरण
स्विट्जरलैंड में महामंथन की तैयारी, मध्यस्थ के रूप में भारत और ब्राज़ील पर टिकी दुनिया की निगाहें

जिनेवा/नई दिल्ली (इंटरनेशनल एवं डिप्लोमैटिक डेस्क): वर्षों से जारी भीषण तबाही, लाखों मौतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर देने वाले रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के काले बादलों के बीच शांति की एक मजबूत उम्मीद जागी है। इस विनाशकारी संघर्ष का कूटनीतिक समाधान निकालने के लिए तटस्थ देश स्विट्जरलैंड में एक नए और निर्णायक दौर की ‘वैश्विक शांति वार्ता’ (Global Peace Summit) शुरू होने जा रही है। इस बार वार्ता की सबसे खास बात यह है कि इसमें पश्चिमी देशों के एकाधिकार के बजाय ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज को प्रमुखता दी जा रही है। शांति के इस जटिल फॉर्मूले को सुलझाने के लिए मुख्य मध्यस्थ (Mediator) के रूप में भारत और ब्राज़ील जैसे ताकतवर तटस्थ देशों को आमंत्रित किया गया है।
क्यों पड़ी भारत और ब्राज़ील की जरूरत?
रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई प्रयास इसलिए विफल रहे क्योंकि मध्यस्थता करने वाले देश (जैसे तुर्की या पश्चिमी देश) किसी न किसी रूप में एक पक्ष की ओर झुके हुए माने जाते थे। रूस पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करता और यूक्रेन रूस की शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे ‘डेडॉक’ (गतिरोध) को तोड़ने के लिए दुनिया को ऐसे देशों की जरूरत थी जिनका मास्को और पश्चिमी राजधानियों, दोनों जगह समान सम्मान हो।
भारत की कूटनीतिक स्थिति इस मामले में सबसे अद्वितीय है। भारत ने शुरू से ही युद्ध की निंदा की है और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सम्मान की वकालत की है, लेकिन उसने कभी भी रूस के खिलाफ एकतरफा पश्चिमी प्रतिबंधों का आंख मूंदकर समर्थन नहीं किया। प्रधानमंत्री का यह बयान कि “यह युग युद्ध का नहीं है” (This is not an era of war), वैश्विक कूटनीति का मूलमंत्र बन चुका है। इसी तरह, ब्राज़ील भी ब्रिक्स (BRICS) का अहम सदस्य है और दोनों पक्षों से संवाद करने में सक्षम है।
शांति वार्ता का मुख्य एजेंडा क्या है?
स्विट्जरलैंड में होने वाली इस उच्च स्तरीय वार्ता में युद्धविराम (Ceasefire) से परे कई अहम और गंभीर मुद्दों पर चर्चा होगी:
- परमाणु सुरक्षा (Nuclear Safety): ज़ापोरिज्जिया जैसे परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना ताकि किसी भी तरह के रेडिएशन खतरे को टाला जा सके।
- खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा: काला सागर (Black Sea) के रास्ते अनाज और फर्टिलाइजर का निर्बाध निर्यात फिर से शुरू करना, जो अफ्रीकी और एशियाई देशों के लिए जीवनरेखा है।
- युद्धबंदियों की अदला-बदली: दोनों देशों के कब्जे वाले युद्धबंदियों (POWs) की रिहाई के लिए एक मानवीय कॉरिडोर बनाना।
- क्षेत्रीय अखंडता: सबसे जटिल मुद्दा उन यूक्रेनी क्षेत्रों का है जिन पर रूस ने नियंत्रण कर लिया है। भारत और ब्राज़ील इस विवादित मुद्दे पर एक बीच का रास्ता (Middle path) निकालने की कोशिश करेंगे।
भारत के लिए कूटनीतिक जीत का अवसर
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का मानना है कि यदि भारत इस शांति वार्ता को किसी तार्किक और सकारात्मक निष्कर्ष तक ले जाने में सफल रहता है, तो यह सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। इससे वैश्विक मंच पर भारत की छवि केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि ‘विश्वमित्र’ और एक जिम्मेदार ‘ग्लोबल पीसमेकर’ के रूप में स्थापित होगी।
स्विट्जरलैंड का यह शांति शिखर सम्मेलन एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया की महज शुरुआत है। हालांकि एक ही बैठक में सारे विवाद सुलझने की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी, लेकिन बंद हो चुकी बातचीत की मेज पर दोनों पक्षों को वापस लाना ही अपने आप में भारत और ब्राज़ील की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है। पूरी दुनिया की सांसें अब जिनेवा की इस मेज पर टिक गई हैं।



