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ऐतिहासिक खोज: पूर्वांचल का ‘लोथल’ बना जौनपुर-वाराणसी बॉर्डर, 5000 साल पुराने व्यापारिक केंद्र में मिले ‘प्राचीन जलमार्ग’ के साक्ष्य

वाराणसी/जौनपुर (आर्कियोलॉजी एवं हेरिटेज डेस्क): उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में चल रही पुरातात्विक खुदाई ने एक बार फिर भारतीय इतिहास के पन्नों में एक बड़ा और युगांतरकारी बदलाव कर दिया है। जौनपुर और वाराणसी की सीमा पर गंगा घाटी में मिले 5000 साल पुराने प्राचीन व्यापारिक केंद्र के उत्खनन में आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम को एक शानदार कामयाबी मिली है। टीम को इस स्थल से ‘प्राचीन जलमार्ग’ (Ancient Waterway) और उन्नत डॉकयार्ड (बंदरगाह) जैसी संरचनाओं के पुख्ता साक्ष्य मिले हैं। इस अभूतपूर्व खोज के बाद एएसआई के शीर्ष विशेषज्ञों ने इस ऐतिहासिक स्थल को ‘पूर्वांचल का लोथल’ करार दिया है।

लोथल से क्यों हो रही है तुलना?
इतिहास के जानकारों के अनुसार, ‘लोथल’ (गुजरात) को सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे प्रमुख और उन्नत बंदरगाह शहर माना जाता था, जहां से समुद्री मार्गों के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता था। जौनपुर-वाराणसी बॉर्डर पर गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे मिले इस नए स्थल की वास्तुकला और भौगोलिक स्थिति बिल्कुल लोथल जैसी ही प्रतीत हो रही है। खुदाई में पकी ईंटों से बने घाट, जहाजों या नावों को बांधने के लिए इस्तेमाल होने वाले पत्थर के बड़े लंगर (Anchors), और माल चढ़ाने-उतारने के लिए बने चबूतरे (Loading Docks) जैसी संरचनाएं मिली हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि 5000 साल पहले भी इस क्षेत्र के लोग परिवहन और व्यापार के लिए जलमार्गों का कितने उन्नत और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करते थे।

नदियों के जरिए होता था व्यापक व्यापार
इस प्राचीन जलमार्ग के साक्ष्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उस दौर में गंगा और गोमती जैसी नदियां केवल जल का स्रोत नहीं थीं, बल्कि वे ‘प्राचीन राष्ट्रीय राजमार्ग’ (Ancient National Highways) की तरह काम करती थीं। एएसआई के अधिकारियों का मानना है कि इस जलमार्ग के जरिए कृषि उत्पाद, कीमती पत्थर, सूती कपड़े, और तांबे के बर्तन बड़े पैमाने पर दूसरी सभ्यताओं (जैसे हड़प्पा के अन्य क्षेत्रों) तक भेजे जाते थे। यह व्यापारिक केंद्र संभवतः मध्य भारत को पूर्वी तट और संभवतः बंगाल की खाड़ी के जरिए बाहरी दुनिया से जोड़ने वाली एक अहम कड़ी (Connecting link) था।

आर्थिक और लॉजिस्टिक समझ का बेहतरीन उदाहरण
इस खुदाई स्थल से प्राप्त साक्ष्य यह भी दर्शाते हैं कि उस युग के व्यापारियों को लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की गहरी समझ थी। भारी माल की ढुलाई के लिए सड़क मार्ग के बजाय जलमार्ग का चयन करना उनकी आर्थिक दूरदर्शिता को दिखाता है। गोताखोरों और पुरातात्विक विशेषज्ञों की एक विशेष टीम अब नदी के तलहटी क्षेत्रों की भी ‘अंडरवाटर मैपिंग’ (Underwater Mapping) कर रही है, ताकि डूबी हुई नावों या व्यापारिक सामग्री के और भी सुराग जुटाए जा सकें।

पर्यटन और इतिहास के लिए नया अध्याय
‘पूर्वांचल के लोथल’ के रूप में इस स्थल की पहचान उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव को कई गुना बढ़ा देती है। राज्य सरकार अब इस पूरे इलाके को एक ‘मेगा हेरिटेज टूरिज्म सर्किट’ के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। यह खोज न केवल इतिहासकारों के लिए शोध का एक नया विषय है, बल्कि यह दुनिया को यह भी बताती है कि गंगा के मैदानी इलाकों में शहरीकरण और व्यापारिक क्रांति उम्मीद से कहीं अधिक पहले शुरू हो चुकी थी।

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