समुद्री क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए तटीय राज्यों के साथ राष्ट्रीय कार्यशाला हुई आयोजित

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ राष्ट्रीय परामर्श कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला में समुद्री क्षेत्र के प्रमुख हितधारक एक मंच पर आए, ताकि ‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’ के तहत भारत के समुद्री विकास के अगले चरण की रूपरेखा तैयार की जा सके।
इस कार्यशाला ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को राज्य-स्तरीय योजनाओं के साथ जोड़ने के लिए सहयोगात्मक मंच के रूप में काम किया। इसका मुख्य उद्देश्य बंदरगाह-आधारित विकास को गति देना, लॉजिस्टिक्स दक्षता को मज़बूत करना और डिजिटल व टिकाऊ समुद्री प्रथाओं को बढ़ावा देना है।
इस अवसर पर मुख्य भाषण में पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सचिव श्री विजय कुमार (आईएएस) ने हाल के वर्षों में भारत के समुद्री क्षेत्र में आए महत्वपूर्ण बदलावों पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि बंदरगाहों के प्रदर्शन में सुधार, वैश्विक रैंकिंग में बढ़त और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क के साथ बढ़ते एकीकरण से ये बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि भारत नीतिगत सुधारों, बुनियादी ढांचे के विस्तार और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के सहारे, प्रतिस्पर्धी समुद्री राष्ट्र के रूप में अपनी स्थिति लगातार मज़बूत कर रहा है।
‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’ पर आधारित, सरकार की यह दीर्घकालिक रूपरेखा बंदरगाहों, तटीय नौवहन, अंतर्देशीय जलमार्गों, जहाज़ निर्माण और हरित नौवहन (ग्रीन शिपिंग) जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की परिकल्पना करती है। जैसा कि पृष्ठभूमि रूपरेखा में रेखांकित किया गया है, यह विज़न विकास के प्रमुख वाहक के रूप में आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण और स्थिरता पर विशेष ज़ोर देता है।
चर्चाओं का मुख्य केंद्र गैर-प्रमुख बंदरगाहों (प्रमुख बंदरगाहों के अलावा) की भूमिका थी, जो देश के लगभग 46% कार्गो को संभालते हैं। सचिव ने क्षेत्रीय विकास और तटीय लॉजिस्टिक्स में उनके महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार किया। उन्होंने विशेष रूप से प्रक्रिया मानकीकरण, डिजिटल एकीकरण और परिचालन दक्षता के क्षेत्रों में इन बंदरगाहों को राष्ट्रीय ढांचों के साथ और अधिक निकटता से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यशाला की चर्चाएं तीन मुख्य विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित थीं: क्षेत्रीय अवलोकन, विनियामक और डिजिटल सुधार, तथा क्षमता विस्तार और दक्षता वृद्धि के लिए राज्य-स्तरीय पहल। चर्चाओं ने बुनियादी ढांचे के विकास, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) ढांचों और ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ (व्यापार करने में आसानी) उपायों में हुई प्रगति की जानकारी दी। इसके साथ ही सुधार के भावी क्षेत्रों की भी पहचान की गई।



