महिला आरक्षण पर अब याचना नहीं, रण होगा : रेखा गुप्ता

नई दिल्ली : दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार को विधानसभा के विशेष सत्र में कहा कि केंद्र सरकार ने विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ पारित किया था। इसके लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक भी प्रस्तुत किया ताकि महिलाओं को जल्द लाभ मिल सके। लेकिन 16, 17 और 18 अप्रैल के दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक दुखद अध्याय के रूप में दर्ज हुए हैं। इन दिनों पूरे देश की महिलाएं लोकसभा की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही थीं कि 78 वर्षों का लंबा इंतजार अब समाप्त होगा और उन्हें विधानसभाओं तथा लोकसभा में प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा। लेकिन इन दिनों हुई चर्चाओं ने निराशा ही दी।
मुख्यमंत्री ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा के दौरान कहा कि अब समय आ गया है कि महिलाएं अपने अधिकारों के लिए स्वयं खड़ी हों। अब याचना नहीं, रण होगा और महासंग्राम भीषण होगा। उन्होंने कहा कि लंबे समय से महिलाएं देख रही हैं कि विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा केवल दिखावे और षड्यंत्र किए गए हैं, लेकिन न्याय सुनिश्चित नहीं किया गया। देश की महिलाएं अब अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम हैं और पूरे देश में एकजुटता के साथ आगे बढ़ रही हैं। अब हर दिशा से एक ही आवाज उठ रही है कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ लागू होना चाहिए और यह होकर रहेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महिला आरक्षण इसलिए जरूरी है क्योंकि महिलाओं को सामाजिक बाधाओं और चुनौतियों का सामना पुरुषों की तुलना में अधिक करना पड़ता है। ऐसे में केवल अधिकार नहीं, बल्कि विशेष प्रावधान ही समान अवसर सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने बताया कि आरक्षण और जनसमर्थन के जरिए ही उन्हें जनसेवा का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि पंचायत व स्थानीय निकायों में बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी जाती हैं, लेकिन विधानसभा और संसद तक उनकी भागीदारी काफी कम रह जाती है। देश में लगभग 4600 विधायकों में केवल 10 प्रतिशत महिलाएं हैं और लोकसभा-राज्यसभा में भी उनकी हिस्सेदारी करीब 13-14 प्रतिशत ही है, जो अवसरों की कमी को दर्शाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार और चुनाव का अवसर तो दिया, पर केवल इससे वे आगे नहीं बढ़ सकीं और उन्हें राजनीतिक अवसरों से वंचित रखा गया। उन्होंने बताया कि महिला आरक्षण विधेयक 27 वर्षों में सात बार संसद में आया, लेकिन हर बार रोका गया। कई दलों ने बाधाएं खड़ी कीं और महिलाओं को सीमित भूमिका में रखा, जबकि भाजपा ने उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ लाया गया, जो महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। इसके क्रियान्वयन में तकनीकी प्रक्रियाओं, जैसे परिसीमन आदि के कारण समय लगने की संभावना को देखते हुए, सरकार ने इसे शीघ्र लागू करने के उद्देश्य से आवश्यक संशोधनों का प्रस्ताव रखा। लेकिन विपक्षी दलों ने इस दिशा में भी आपत्तियां उठाकर और तकनीकी मुद्दों को आधार बनाकर इस विधेयक को पारित होने से रोकने का प्रयास किया। यह स्पष्ट रूप से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखने का प्रयास है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह विषय केवल एक विधेयक का नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकार और सम्मान का है। किसी भी पुरुष प्रतिनिधि के लिए अपनी सीट छोड़कर महिला को स्थान देना सहज निर्णय नहीं होता। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए ऐसा प्रारूप प्रस्तावित किया गया, जिसमें सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सके। इस व्यवस्था से क्षेत्रीय दलों को भी लाभ होता और दक्षिण भारत के राज्यों की सीटों पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि यह समझ से परे है कि इस प्रस्ताव में विपक्ष को आपत्ति किस बात पर थी, जबकि इसमें सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा गया था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कि ओबीसी महिलाओं के संदर्भ में ‘कोटे में कोटा’ की मांग भी केवल बहाने के रूप में प्रस्तुत की गई, जबकि पूर्व में इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। विभिन्न तकनीकी और राजनीतिक मुद्दों को आधार बनाकर इस विधेयक को टालने का प्रयास किया गया, जबकि मूल उद्देश्य केवल महिलाओं को उनका अधिकार दिलाना था। आज महिलाओं के नाम पर केवल मुद्दों को उलझाने का प्रयास किया जा रहा है। कभी 543 सीटों की बात, कभी 850 सीटों की, कभी परिसीमन की, कभी क्षेत्रीय संतुलन की। इस विधेयक के पारित न होने के बाद जिस प्रकार कुछ दलों द्वारा उत्सव मनाया गया, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने आम आदमी पार्टी (आआपा) की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘सत्याग्रह’ जैसे पवित्र शब्द का दुरुपयोग करते हुए न्यायिक प्रक्रिया से बचने की बात करना गलत है। महात्मा गांधी की विचारधारा का इस तरह इस्तेमाल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और कानून से ऊपर खुद को रखना गंभीर विरोधाभास दर्शाता है। जब न्याय देने वाली महिला न्यायाधीश होती हैं तो कुछ लोग उसे स्वीकार नहीं कर पाते, जो महिला-विरोधी मानसिकता को दर्शाता है। यह सब अपने कृत्यों के उजागर होने के डर को दिखाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे व्यवहार से सदन की कार्यवाही भी प्रभावित होती है और यह ‘मेरी मर्जी’ वाली मानसिकता को दर्शाता है, जहां व्यक्ति खुद को कानून से ऊपर समझकर न्यायिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश करता है। कोई व्यक्ति खुद ही मुजरिम, गवाह, वकील और न्यायाधीश बनने लगे, यह लोकतंत्र के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय केवल न्यायपालिका ही करेगी। उन्होंने कहा कि जनता को गुमराह किया गया है और किए गए कार्यों का परिणाम जरूर सामने आएगा। साथ ही, उन्होंने सुश्री आतिशी के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि जिस परिस्थितियों में वे काम कर रही हैं, वे कठिन हैं और उनका वक्तव्य न दे पाना भी संभवतः किसी कारणवश हुआ है।



