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कर्नाटक के यादगीर में हड़कंप: 3,000 से अधिक पंजीकृत गर्भवती महिलाएं लापता, कन्या भ्रूण हत्या की गहरी आशंका

कर्नाटक राज्य के यादगीर (Yadagiri) जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और विचलित करने वाली खबर सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग के उस समय होश उड़ गए जब उन्हें पता चला कि जिले में पंजीकृत 3,000 से अधिक गर्भवती महिलाओं का कोई आधिकारिक सुराग नहीं मिल रहा है। इस घटना ने पूरे राज्य के प्रशासनिक और स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है। इतनी भारी संख्या में महिलाओं के लापता होने और उनका कोई मेडिकल रिकॉर्ड न मिलने से एक बड़े और संगठित ‘कन्या भ्रूण हत्या’ (Female Foeticide) रैकेट के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है।

क्या है पूरा मामला?
सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली के तहत, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सभी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित करना, उन्हें उचित पोषण प्रदान करना और सुरक्षित प्रसव (Safe Delivery) कराना होता है। आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से इन महिलाओं का नियमित फॉलो-अप किया जाता है। लेकिन यादगीर जिले में जब स्वास्थ्य विभाग ने अपने रिकॉर्ड खंगाले, तो एक खौफनाक सच्चाई सामने आई। जिन 3,000 से अधिक गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण किया गया था, उनके प्रसव या वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति का कोई भी डेटा मौजूद ही नहीं है। विभाग के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि ये महिलाएं कहां गईं और उनके गर्भस्थ शिशुओं का क्या हुआ।

कन्या भ्रूण हत्या का गहराता शक:
इतनी बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं का अचानक स्वास्थ्य प्रणाली के रडार से गायब हो जाना कोई सामान्य तकनीकी खामी या भूल-चूक नहीं हो सकती। प्रशासन और बाल विकास से जुड़े विशेषज्ञों को इस बात का गहरा डर है कि इन महिलाओं ने अवैध रूप से लिंग परीक्षण (Sex Determination Test) करवाया होगा। यदि गर्भ में पल रहा शिशु कन्या रही होगी, तो गैर-कानूनी तरीके से उनका गर्भपात (Abortion) करा दिया गया होगा। भारत में पीसीपीएनडीटी एक्ट (PCPNDT Act) के तहत जन्म से पूर्व लिंग की जांच करना और कन्या भ्रूण हत्या एक अत्यंत गंभीर कानूनी अपराध है। इसके बावजूद, इस तरह के आंकड़े सिस्टम की एक बहुत बड़ी नाकामी को दर्शाते हैं।

स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल:
यह घटना सीधे तौर पर जमीनी स्तर पर काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों, अवैध निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों और क्लीनिकों की मिलीभगत की ओर इशारा करती है। बिना किसी मजबूत स्थानीय नेटवर्क और भ्रष्ट मेडिकल पेशेवरों की मदद के, इतने बड़े पैमाने पर अवैध गर्भपात या भ्रूण हत्या को अंजाम देना संभव नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब इन महिलाओं का नियमित चेकअप होना था, तो संबंधित अधिकारियों ने समय रहते इस विसंगति को क्यों नहीं पकड़ा? यह पूरे स्वास्थ्य निगरानी तंत्र पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

बेटियों के अस्तित्व पर मंडराता संकट:
देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कई राष्ट्रीय अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य बालिकाओं के गिरते लिंगानुपात (Sex Ratio) को सुधारना है। लेकिन यादगीर का यह मामला इन सभी प्रयासों को गहरी ठेस पहुंचाता है। यह दर्शाता है कि कड़े कानूनों के बावजूद उन लोगों में कोई खौफ नहीं है जो चंद रुपयों के लालच में इस जघन्य अपराध में लिप्त हैं।

आगे की कार्रवाई:
इस बड़े खुलासे के बाद अब सरकार और प्रशासन पर सख्त कार्रवाई का भारी दबाव है। मामले की त्वरित और उच्च स्तरीय जांच की आवश्यकता है ताकि लापता महिलाओं का पता लगाया जा सके और उन सभी अवैध क्लीनिकों का पर्दाफाश हो सके जो इस काले कारोबार में शामिल हैं। दोषियों को ऐसी कड़ी सजा मिलनी चाहिए जो पूरे देश के लिए एक नजीर बन सके, ताकि भविष्य में बेटियों को जन्म लेने से पहले मारने की कोई हिम्मत न कर सके।

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