सत्यजीत रे : भारतीय सिनेमा की महान विभूति की जयंती

( विवेक ओझा): एक ऐसा इंसान जो पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न, और ऑस्कर अवॉर्ड से अलंकृत फ़िल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक था। भारतीय सिनेमा का एक ऐसा नायक जिसे 1978 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल की संचालक समिति ने विश्व के तीन सर्वकालिक निर्देशकों में से एक के रूप में सम्मानित किया था। आज उस महान सिनेमाई व्यक्तित्व सत्यजीत रे की बर्थ एनीवर्सरी है । उनकी जयंती भारतीय सिनेमा को उनके दिए योगदान के स्मरण का दिवस है।
भारत सरकार की ओर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं के लिए उन्हें 32 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। सत्यजीत रे दूसरे फिल्मकार थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।
1985 में उन्हें हिंदी फिल्म उद्योग के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 1992 में उन्हें भारत रत्न भी मिला और ऑस्कर (ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) भी वो सम्मानित किए गए।
सत्यजीत रे का शुरुआती जीवन :
2 मई , 1921 को कलकत्ता की रचनात्मक भूमि पर उनका जन्म हुआ। 3 साल की उम्र में ही उन्होंने अपने पिता सुकमार रे को खो दिया।उनकी माता सुप्रभा रे ने इस विकट परिस्थिति में सत्यजीत रे का लालन पालन बहुत कठिनाइयों से किया। सत्यजीत जब युवा हुए वो प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र पढ़ने गए और फिर आगे की पढ़ाई के लिए वो शांति निकेतन गए और अगले 5 साल वहीं रहे। इसके बाद 1943 वे फिर कलकत्ता आ गए और बतौर ग्राफिक डिजाइनर काम करने लगे।
ग्राफिक डिजाइनर के रूप में सत्यजीत रे की भूमिका :
सत्यजीत रे ने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में एक ग्राफिक डिजाइनर के रूप में कई मशहूर किताबों के आवरण यानी कवर डिजाइन किए जिनमें जिम कॉर्बेट की ‘मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं’ और जवाहरलाल नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ शामिल है।
अपने फ़िल्म निर्माण की क्षमता को सत्यजीत रे ने तब पहचाना जब वे फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से 1949 में मिले । उस वर्ष रेनोआ अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए कलकत्ता आये थे। 1950 में सत्यजीत रे को लंदन जाने का अवसर मिला और अंग्रेजी फिल्म ‘बाइसकिल थीव्स’ देखने के बाद उनका फ़िल्म निर्माण का संकल्प मजबूत हो गया। अब उनके दिमाग में उनकी पहली फ़िल्म पाथेर पांचाली की संरचना घूमने लगी । गौरतलब है कि 1928 में विभूतिभूषण बंधोपाध्याय का मशहूर उपन्यास पाथेर पांचाली प्रकाशित हुआ था और सत्यजीत रे ने इस उपन्यास के बाल संस्करण को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका नाम था अम अंतिर भेपू (आम के बीज की सीटी) । रे इस किताब से बहुत प्रभावित भी हुए थे। उन्होंने इस किताब का कवर तो बनाया ही इसके लिए कई रेखाचित्र भी तैयार किए जो बाद में उनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के खूबसूरत और मशहूर शॉट्स बने। 1955 में सत्यजीत रे की पहली फ़िल्म पाथेर पांचाली परदे पर आई थी और उसने दर्शकों का मन मोह लिया था। इसे फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट का विशेष पुरस्कार भी मिला।
सत्यजीत रे की प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं : पारस पत्थर, कंचनजंघा, महापुरुष, अपूर संसार, महानगर, चारूलता, अपराजितो, गूपी गायन-बाघा बायन ।
1977 में उनकी एकमात्र फिल्म शतरंज के खिलाड़ी आई। जबकि 1991 में प्रदर्शित आंगतुक सत्यजीत रे के सिने करियर की अंतिम फिल्म थी। भारतीय सिनेमा के विकास और संवर्धन के लिए कई लोगों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है लेकिन जब भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहुंचाने की बात हो तो वहां पर सत्यजीत रे का नाम सबसे पहले आता है। आज भी उनकी अमिट छाप भारतीय सिनेमा पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती। 23 अप्रैल 1992 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से इस महान रचनाधर्मी व्यक्तित्व का निधन हो गया था।



