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1857 की क्रांति के नायक वीर कुंवर सिंह की पुण्यतिथि पर उनसे जुड़ी ख़ास बातें

 ( विवेक ओझा ): ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है कि “यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र लगभग 80 साल की थी। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेज़ों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता। ” वर्ष 1777 में बिहार के भोजपुर ज़िले के जगदीशपुर गाँव में जन्मे वीर कुंवर सिंह ( Babu Kunwar Singh death anniversary) की आज पुण्यतिथि है। उनका प्रभाव क्षेत्र बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, आज़मगढ़, बलिया, गाज़ीपुर समेत बिहार के शाहाबाद, मगध प्रमंडल, दानापुर और समूचा चंपारण था। इन इलाकों के विभिन्न दलित जातियों और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लोगों के भी वीर कुंवर सिंह ही महानायक थे।

उस व्यक्ति को 25 हजार रुपए पुरस्कार में दिए जाएंगे, जो बाबू कुंवर सिंह को जीवित अवस्था में किसी ब्रिटिश चौकी अथवा कैंप में सुपुर्द करेगा’- गवर्नर जनरल भारत सरकार के सचिव के हस्ताक्षर से 12 अप्रैल, 1858 की इस घोषणा से यह साबित होता है कि अंग्रेज सरकार इस महानायक से कितना डरी हुई थी। वह उन्हें जीवित पकड़ना चाहती थी पर हमेशा असफल रही। कुंवर सिंह को ‘बाबू साहब’ और ‘तेगवा बहादुर’ के नाम से संबोधित किया जाता है। होली के अवसर पर विशेषकर भोजपुरी भाषी एक गीत गाते है-‘बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अवीर’।

27 जुलाई, 1857 को दानापुर छावनी से विद्रोह कर आए सैनिकों ने बाबू कुंवर सिह का नेतृत्व स्वीकार किया। ब्वायल कोठी/आरा हाउस, जिसमें अंग्रेज छिपे थे उसे घेर लिया। अंग्रेजों की रक्षा हेतु 29 जुलाई को डनबर के नेतृत्व में दानापुर से सेना भेजी गई। युद्ध में डनबर मारा गया। डनबर के मारे जाने की सूचना मिलने पर मेजर विसेंट आयर, जो स्टीमर से प्रयागराज जा रहा था, बक्सर से वापस आरा लौटा और दो अगस्त को चर्चित ‘बीबीगंज’ का युद्ध हुआ। आरा पर नियंत्रण के बाद आयर ने 12 अगस्त को जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया।

कुंवर सिंह 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान एक उल्लेखनीय नेता थे। वह वर्तमान में जगदीसपुर के शाही उज्जैनिया (पंवार) राजपूत घर से संबंधित थे, वर्तमान में भारत के बिहार, भोजपुर जिले का हिस्सा है। 80 साल की उम्र में, उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आदेश के तहत सैनिकों के खिलाफ सशस्त्र सैनिकों का चयन बैंड का नेतृत्व किया। वह बिहार में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के मुख्य आयोजक थे। उन्हें वीर कुंवर सिंह के रूप में जाना जाता है।14 अगस्त, 1857 को जगदीशपुर हाथ से निकल जाने के बाद कुंवर सिंह अपने 1200 सैनिकों को लेकर एक महाअभियान पर निकल पड़े। रोहतास, रीवां, बांदा, ग्वालियर, कानपुर, लखनऊ होते हुए 12 फरवरी, 1858 को अयोध्या तथा 18 मार्च, 1858 को आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया नामक स्थान पर आकर डेरा डाला। उनके काफिले में 1,000 सैनिक और 2,500 समर्थकों के होने का उल्लेख मिलता है। आजमगढ़ आने का उनका उद्देश्य शत्रु को पराजित कर प्रयागराज एवं बनारस पर आक्रमण करते हुए अपने गढ़ जगदीशपुर पर पुन: अपना अधिकार स्थपित करना था।

बाबू कुंवर सिह छापामार युद्ध में निपुण थे, अत: आठ माह तक अंग्रेज उनका मुकाबला करने से बचते रहे। अंग्रेजों को जब उनकी योजना का पता चला तो तुरंत मिलमैन 22 मार्च को सेना लेकर मुकाबले के लिए आया और कुंवर सिंह ने चकमा देकर उस पर आक्रमण कर दिया। मिलमैन की मदद के लिए आए कर्नल डेम्स को भी 28 मार्च को हार का सामना करना पड़ा। मिलमैन और डेम्स की फौज कुंवर सिंह की फौज से पराजित हो चुकी थी। इस पराजय से बेचैन लार्ड कैनिंग ने मार्ककेर को युद्ध के लिए भेजा। 500 सैनिकों और आठ तोपों से सळ्सज्जित मार्ककेर की सहायता हेतु सेनापति कैंपबेल ने एडवर्ड लगर्ड को भी आजमगढ़ पहुंचने का आदेश दिया। तमसा नदी के तट पर हुए इस युद्ध में लगर्ड पराजित हुआ।

अपनी आखिरी लड़ाई उन्होंने जगदीसपुर के पास 23 अप्रैल 1858 को लड़ी, ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में सेना पूरी तरह से रुक गई थी। 22 और 23 अप्रैल को घायल होकर भी उन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ बहादुरी से लड़ा और उनकी सेना की मदद से ब्रिटिश सेना को हटा दिया, यूनियन जैक को जगदीशपुर किले से नीचे लाया और अपना ध्वज फहराया गया।

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