सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ‘वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं’, राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश पलटा

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि वोट देना (Right to Vote) और चुनाव लड़ना (Right to Contest) नागरिकों का ‘मौलिक अधिकार’ (Fundamental Right) नहीं है। यह स्पष्टीकरण सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान उच्च न्यायालय के एक आदेश को पलटते हुए दिया है। भारतीय राजव्यवस्था और कानूनी दृष्टिकोण से यह एक बड़ा फैसला है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा कानूनी विवाद राजस्थान के डेयरी सहकारी समितियों के चुनाव से जुड़ा हुआ है। ‘राम चंद्र चौधरी और अन्य बनाम रूप नगर दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति लिमिटेड’ मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया। इससे पहले, राजस्थान हाईकोर्ट ने जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों द्वारा बनाए गए चुनाव संबंधी कुछ उपनियमों (Bye-laws) को अधिकारतीत (Ultra Vires) या अवैध करार दे दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और राजस्थान HC का आदेश रद्द
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को सिरे से रद्द कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि चुनाव से जुड़े अधिकार पूरी तरह से वैधानिक (Statutory) होते हैं। इन्हें भारत के संविधान के भाग III के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का दर्जा प्राप्त नहीं है। न्यायालय ने कहा कि सहकारी समितियों को अपने चुनाव के संचालन के लिए नियम और उपनियम बनाने का अधिकार है।
संवैधानिक दृष्टिकोण: मौलिक अधिकार बनाम वैधानिक अधिकार
अक्सर आम जनता में यह भ्रम रहता है कि मतदान करना जीवन या स्वतंत्रता के अधिकार की तरह ही एक ‘मौलिक अधिकार’ है। हालांकि, कानूनी रूप से ऐसा नहीं है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 (Article 326) के तहत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान जरूर है, जो इसे एक ‘संवैधानिक अधिकार’ (Constitutional Right) बनाता है। इसके अलावा, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) के तहत यह एक ‘वैधानिक या विधिक अधिकार’ (Statutory Right) है। लेकिन, यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 या 21 की तरह एक निरपेक्ष ‘मौलिक अधिकार’ नहीं है, जिसे किसी भी स्थिति में छीना न जा सके।
फैसले का आगे का प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि किसी भी चुनाव प्रक्रिया (चाहे वह पंचायत हो, सहकारी समिति हो, या विधानसभा) में भाग लेने और वोट देने के नियम संबंधित कानूनों (Statutes) द्वारा ही तय और नियंत्रित होंगे। यह फैसला न केवल सहकारी समितियों के संस्थागत कामकाज में कानूनी स्पष्टता लाएगा, बल्कि भविष्य में चुनाव लड़ने की योग्यताओं और अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए एक बेहद अहम कानूनी नजीर (Precedent) का काम भी करेगा।



