'शीघ्र सुनवाई एक मौलिक अधिकार है', सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; कहा- कोई कानून और नियम संविधान से ऊपर नहीं

अभिषेक सिंह
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (5 नवंबर, 2026) को एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि संविधान देश के सभी कानूनों और नियमों से ऊपर है। जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि एनडीपीएस (NDPS), यूएपीए (UAPA) और पीएमएलए (PMLA) जैसे विशेष कानूनों और संविधान के प्रावधानों में किसी भी तरह का टकराव होने पर संविधान ही प्रभावी होगा।
शीघ्र सुनवाई का अधिकार मौलिक अधिकार
पीठ ने अपने फैसले में दोहराया कि 'त्वरित सुनवाई' (Speedy Trial) का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न और आवश्यक हिस्सा है। यह सिर्फ एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि इसे किसी भी विशेष कानून का इस्तेमाल करके उल्लंघन नहीं किया जा सकता, और अगर किसी आरोपी को लंबे समय तक बिना सुनवाई के हिरासत में रखा जाता है, तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा, जो उसके जमानत का आधार बन सकता है।
'संविधान की व्याख्या कानूनों से नहीं, कानूनों की व्याख्या संविधान से हो'
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान की व्याख्या कानूनों के आधार पर नहीं की जा सकती, बल्कि कानूनों की व्याख्या संविधान के आधार पर होनी चाहिए। कोई भी कानून, चाहे वह विशेष हो या सामान्य, संविधान की व्याख्या का मार्गदर्शक नहीं बन सकता। मौलिक अधिकारों के साथ हल्के ढंग से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, चाहे मामला किसी भी विशेष कानून का ही क्यों न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पुराने आदेश पर उठाए सवाल
अदालत ने अपने ही पहले के एक आदेश पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि एनडीपीएस एक्ट जैसे विशेष कानूनों में आरोपी को अनुच्छेद 21 का अधिकार धारा 37 की सख्त शर्तों के अंदर ही इस्तेमाल करना होगा और सिर्फ देरी के आधार पर धारा 37 को ओवरराइड नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी कहा कि मौलिक अधिकार की व्याख्या इस तरह होनी चाहिए कि वह उस अधिकार के उद्देश्य को आगे बढ़ाए, न कि उसे सीमित करे।
देशभर के मुकदमों पर पड़ेगा असर
इस फैसले का असर देशभर के उन हजारों मुकदमों पर पड़ेगा, जिनमें आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हैं और उनकी सुनवाई में देरी हो रही है। विशेष रूप से NDPS, UAPA और PMLA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में यह फैसला आरोपियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि अब 'शीघ्र सुनवाई' के अधिकार को आधार बनाकर जमानत मांगी जा सकेगी।
राजनीतिक और कानूनी प्रतिक्रिया
इस फैसले का कानूनी विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह संविधान की सर्वोच्चता को स्थापित करने वाला ऐतिहासिक फैसला है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी विशेष कानून मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकता। फिलहाल, इस मामले में आगे की सुनवाई जारी रहेगी।
