अमेरिकी सपना छोड़ वतन वापसी को मजबूर भारतीय टेक प्रोफेशनल्स, ग्रीन कार्ड का लंबा इंतजार और छंटनी का डर

विवेक ओझा
नई दिल्ली: अमेरिका में अपना करियर बनाने और बसने का सपना देख रहे भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए हालात तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त आव्रजन और वीजा नीतियों, टेक सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के कारण हो रही छंटनी, और H-1B वीजा तथा ग्रीन कार्ड बैकलॉग को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के चलते बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब भारत लौट रहे हैं।
2026 में अब तक 12,900 प्रोफेशनल्स लौटे
स्टाफिंग फर्म 'एक्सफेनो' (Xpheno) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 में अब तक 12,900 टेक प्रोफेशनल्स भारत लौट चुके हैं, जबकि पूरे 2025 में यह संख्या 15,100 थी। दूसरी ओर, अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2025 में जहां 21,200 लोग अमेरिका गए थे, वहीं 2026 में अब तक सिर्फ 14,800 लोग ही अमेरिका पहुंचे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो यह पहला ऐसा साल होगा जब अमेरिका से लौटने वाले भारतीयों की संख्या वहां जाने वालों से अधिक हो जाएगी।
लौटने के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?
* ग्रीन कार्ड का 150 साल का इंतजार: भारतीयों के लिए अमेरिका में ग्रीन कार्ड (स्थायी निवास) पाना अब लगभग असंभव होता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीयों के लिए ग्रीन कार्ड की वेटिंग लिस्ट इतनी लंबी है कि कुछ अनुमानों के अनुसार इसे पूरा होने में 150 साल तक लग सकते हैं। इसके अलावा, कई बड़ी कंपनियों (Microsoft, Infosys, Wipro आदि) के लिए PERM प्रोसेस को निलंबित कर दिया गया है, जिससे स्थायी निवास का रास्ता और कठिन हो गया है।
* H-1B वीजा की अनिश्चितता: H-1B वीजा पर काम करने वाले पेशेवरों के पास नौकरी छूटने पर सिर्फ 60 दिनों का समय होता है, जिसके भीतर उन्हें नई नौकरी ढूंढनी होती है, वरना उन्हें देश छोड़ना पड़ता है। यह लगातार बना डर मानसिक तनाव को बढ़ाता है।
* AI और छंटनी का डर: टेक्नोलॉजी क्षेत्र में AI के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कई कंपनियों में छंटनी हो रही है, जिससे अमेरिका में नौकरियों की सुरक्षा को लेकर संदेह पैदा हो गया है।
वतन लौटने पर क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि, अमेरिका से लौटना भी इतना आसान नहीं है। कई पेशेवरों ने अमेरिका में सालों तक काम करने के बाद वापसी की है, लेकिन भारत में उन्हें अपेक्षित वेतन और पद नहीं मिल पा रहे हैं। भारतीय कंपनियां अब सिर्फ विदेशी अनुभव को तवज्जो देने के बजाय विशिष्ट तकनीकी कौशल (जैसे AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी) पर ज्यादा जोर दे रही हैं। इसके अलावा, अमेरिका की तुलना में भारत में वेतन में भारी कटौती का सामना करना पड़ता है। लौटने वालों को अपने बच्चों की शिक्षा और पारिवारिक जीवन को फिर से ढालने जैसी सामाजिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।
भारत के लिए अवसर
हालांकि, इस ट्रेंड को भारत के लिए एक बड़े अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है। भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के तेजी से बढ़ने और टेक इकोसिस्टम के मजबूत होने से कुशल पेशेवरों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं। कई कंपनियां अब भारत में ही उच्च स्तरीय तकनीकी और प्रबंधकीय भूमिकाएं दे रही हैं, जिससे लौटने वाले पेशेवरों को अपने करियर को नई दिशा देने में मदद मिल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, बशर्ते निवेश और नवाचार को प्रोत्साहित किया जाए।
