बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे के बयान से क्यों मची राजनीतिक हलचल, जानिए क्या हैं इसके मायने

बीएस राय। भारतीय राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहां संवैधानिक संस्थाओं को लेकर दिए गए बयान देशभर में बहस का कारण बन जाते हैं। इस बार वरिष्ठ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सुप्रीम कोर्ट और देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना को लेकर दिए गए विवादित बयान ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। संसद की गरिमा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दे अब राजनीति की भट्टी में गरमा रहे हैं।

विवादित टिप्पणी और उसकी पृष्ठभूमि झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है।’ उन्होंने यह भी कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट कानून बनाने का काम करेगा तो ‘संसद और विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए।’

संविधान के अनुच्छेद 368 और 141 का हवाला देते हुए दुबे ने दलील दी कि कानून बनाना संसद का काम है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का काम उनकी व्याख्या करना है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करने और देश को अराजकता की ओर ले जाने का भी आरोप लगाया।

अपने बयान में निशिकांत दुबे ने धारा 377 का हवाला देते हुए LGBTQ+ समुदाय के अधिकारों पर भी विवादित टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि समलैंगिकता को सभी धर्मों में अपराध माना जाता है, और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से इसे मान्यता देकर संविधान की मर्यादा का उल्लंघन किया है।

इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया। विपक्ष ने इस बयान को लोकतंत्र पर हमला बताया और भाजपा की मंशा पर सवाल उठाए। वहीं, भाजपा ने भी इन बयानों से खुद को अलग करने में देर नहीं लगाई।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साफ किया कि सांसद निशिकांत दुबे और पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के बयानों से पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने इसे नेताओं के निजी विचार बताते हुए कहा कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करती है।

इस पूरे प्रकरण से एक बड़ी बहस छिड़ गई है- क्या सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रहा है? क्या न्यायपालिका द्वारा लिए गए कुछ फैसले लोकतांत्रिक संस्थाओं के दायरे में हस्तक्षेप हैं या संवैधानिक व्याख्या का हिस्सा हैं?

संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट न केवल कानूनों की व्याख्या करता है, बल्कि कुछ मामलों में ‘संवैधानिक नैतिकता’ के आधार पर सुधारात्मक कदम भी उठाता है। वहीं, जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि निर्वाचित संस्थाओं को कानून बनाने का प्राथमिक स्रोत होना चाहिए।

Related Articles

Back to top button