बिहार विधानसभा का मानसून सत्र हुआ हंगामेदार: लगातार गिर रहे पुलों के मुद्दे पर विपक्ष का भारी बवाल, सरकार के खिलाफ कार्यस्थगन प्रस्ताव

अभिषेक सिंह/ पटना: बिहार विधानमंडल का मानसून सत्र (Monsoon Session) अपने पहले ही दिन भारी हंगामे, नारेबाजी और राजनीतिक उथल-पुथल की भेंट चढ़ गया। उम्मीद के मुताबिक, विपक्षी दलों—राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और वामपंथी दलों—ने राज्य में पिछले एक पखवाड़े के भीतर लगातार एक दर्जन से अधिक छोटे-बड़े पुलों के गिरने (Bridge Collapses) के मुद्दे पर नीतीश कुमार सरकार को सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह आक्रामक तरीके से घेर लिया है। विपक्ष ने इसे ‘भ्रष्टाचार का चरम’ बताते हुए सदन में कार्यस्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) पेश किया है।
सदन में विपक्ष का आक्रामक रुख
सत्र की शुरुआत होते ही विपक्षी विधायकों ने हाथों में तख्तियां लेकर वेल (Well) में प्रवेश किया और ‘पुल-पुलिया सरकार हाय-हाय’ के नारे लगाने लगे। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विपक्ष ने मांग की कि सरकार सभी अन्य कामकाज रोककर तुरंत ग्रामीण निर्माण विभाग और पथ निर्माण विभाग में हुए कथित महा-घोटाले पर चर्चा कराए। विपक्ष का आरोप है कि ठेकेदारों (Contractors), नौकरशाहों और सत्ताधारी राजनेताओं के नापाक गठजोड़ के कारण निर्माण में घटिया सामग्री (Poor Quality Material) का इस्तेमाल किया गया, जिसका खामियाजा ग्रामीण जनता भुगत रही है।
इस्तीफे की मांग और सरकार का बचाव
विपक्ष ने दोनों संबंधित विभागों के मंत्रियों के तत्काल इस्तीफे की मांग की है। भारी शोरगुल और हंगामे के कारण विधानसभा अध्यक्ष को सदन की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी।
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष (JDU-BJP गठबंधन) ने विपक्ष के इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। सरकार ने पहले ही उच्च स्तरीय जांच समितियां गठित कर दी हैं और कई इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन ठेकेदारों की लापरवाही से पुल गिरे हैं, उन्हें ब्लैकलिस्ट किया जा रहा है और नुकसान की पूरी भरपाई उन्हीं से कराई जाएगी।
आगे का राजनीतिक परिदृश्य
बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए पुलों का गिरना सरकार के सुशासन (Sushasan) के दावे पर एक बड़ा दाग बन गया है। विपक्ष इस मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाला नहीं है। मानसून सत्र के आने वाले दिनों में रोजगार, कानून-व्यवस्था, और बाढ़ के मुद्दे पर भी तीखी बहस होने के पूरे आसार हैं। यदि सरकार विपक्ष के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो यह सत्र बिना किसी बड़े विधायी कामकाज के हंगामे में ही धुल सकता है।



