सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : पत्नी से 13 दिन बात न करने पर पति को मिली तीन साल की सजा, HC का फैसला पलटा

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी की आत्महत्या के मामले में बरी करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद आम बात हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल 13 दिनों तक पत्नी से बात न करने के आधार पर किसी पति को क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने एक व्यक्ति को बरी किया है, जिसे निचली अदालत और मद्रास उच्च न्यायालय ने धारा 498A के तहत क्रूरता का दोषी मानते हुए तीन साल की जेल की सजा सुनाई थी। मामला उस समय का है जब पति ने अपनी पत्नी से 13 दिनों तक बात नहीं की थी, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली। अदालत ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के, केवल बातचीत का न होना इस मामले में क्रूरता का सबूत नहीं है।
क्या था आरोप?
महिला ने अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या की थी। आरोप लगे थे कि शादी के समय महिला के माता-पिता ने 3 लाख रुपये, सोने के आभूषण और अन्य उपहार दिए थे। यह भी आरोप था कि पति अक्सर महिला से उसके माता-पिता से पैसे लाने को कहता था, और ससुराल वाले दहेज की लगातार मांग कर रहे थे, जिससे महिला प्रताड़ित हो रही थी।
इसके अतिरिक्त, आरोपी पति पर यह भी आरोप था कि उसने पत्नी को मायके जाने पर फटकार लगाई थी और फोन पर बात करने से इनकार किया था, जिससे महिला को मानसिक पीड़ा हुई। इन आरोपों के आधार पर पति और चार अन्य पर मामला दर्ज किया गया था, जिसमें सास, ससुर और दो देवर भी शामिल थे। नाबालिग देवर के खिलाफ कोई सुनवाई नहीं हुई थी। उच्च न्यायालय ने इन आरोपों को सही माना और पति की सजा बरकरार रखी।
सबूतों की कमी के कारण बरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोप मुख्य रूप से फोन पर बात न करने और मायके जाने पर नाराजगी से संबंधित थे। कोर्ट ने बताया कि अभियोजन पक्ष को आरोपों को ‘उचित संदेह से परे’ साबित करना था, और यह जिम्मेदारी उसकी थी।
पीठ ने यह भी कहा कि महिला अपने पति के साथ मस्कट नहीं जा सकी क्योंकि पासपोर्ट और वीजा की जटिलताएं थीं। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बिना किसी ठोस सबूत के केवल 13 दिन बात न करने को क्रूरता नहीं माना जा सकता, और इस आधार पर पति को बरी कर दिया।



