आस्था पर ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रहार
मक्का में मई में ही 40 डिग्री के पार पहुंचा पारा, हज यात्रियों के लिए जानलेवा बन रही है भीषण गर्मी

दुनिया भर के लाखों मुसलमानों के लिए जीवन की सबसे पवित्र मानी जाने वाली ‘हज यात्रा’ (Hajj) पर अब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वॉर्मिंग का अत्यंत गंभीर साया मंडराने लगा है। सऊदी अरब के मक्का (Mecca) शहर में इस वर्ष मई महीने में ही तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के खतरनाक स्तर को पार कर गया है। नई जलवायु रिपोर्टों ने चेतावनी दी है कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो खुले आसमान के नीचे होने वाली हज यात्रा के कई चरण शारीरिक रूप से असंभव और मानव जीवन के लिए जानलेवा बन जाएंगे।
हज इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में से एक है, जिसमें दुनिया भर से लगभग 2 से 3 मिलियन (20 से 30 लाख) श्रद्धालु एक साथ मक्का पहुंचते हैं। हज के कई सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान (Rituals), जैसे अराफात के मैदान में पूरे दिन खड़े रहकर प्रार्थना करना और मीना में शैतान को पत्थर मारना (रमी अल-जमरात), खुले आसमान के नीचे और चिलचिलाती धूप में किए जाते हैं।
खतरे की घंटी: हीटस्ट्रोक का बढ़ता डर
विशेषज्ञों के अनुसार, जब हवा का तापमान शरीर के तापमान (37°C) से ऊपर चला जाता है और हवा में नमी (Humidity) का स्तर भी अधिक होता है, तो मानव शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति में शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता, जिससे ‘हीटस्ट्रोक’ (Heatstroke) का खतरा पैदा होता है। हज यात्रा में भाग लेने वाले अधिकांश श्रद्धालु वृद्ध होते हैं, जिन्हें हृदय रोग, मधुमेह या रक्तचाप की समस्या होती है। इतनी भयंकर गर्मी में उनके लिए डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) और हीटस्ट्रोक से बचना एक बहुत बड़ी शारीरिक चुनौती बन गया है।
सऊदी प्रशासन की तैयारियां और विवशता
सऊदी अरब की सरकार इस खतरे से भली-भांति परिचित है और वह अपनी तरफ से हर संभव प्रयास कर रही है। तीर्थयात्रियों को चिलचिलाती धूप से बचाने के लिए मक्का की पवित्र मस्जिद और अनुष्ठान स्थलों पर विशाल छाते (Giant Umbrellas), वॉटर-मिसिंग (पानी की फुहारें फेंकने वाले) पंखे और विशेष रूप से ठंडा किए गए संगमरमर के फर्श लगाए गए हैं। आपात स्थिति से निपटने के लिए हजारों की संख्या में मेडिकल स्टाफ और वातानुकूलित एंबुलेंस भी तैनात की गई हैं।
भविष्य का संकट
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के जलवायु वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भविष्य में हज की तारीखें जब भी अगस्त और सितंबर के भीषण गर्मी वाले महीनों में पड़ेंगी (क्योंकि इस्लामिक कैलेंडर चंद्र चक्र पर आधारित होता है और हर साल 11 दिन पीछे खिसकता है), तब हालात ‘खतरे की लाल सीमा’ (Extreme Danger Zone) को पार कर जाएंगे। यह स्थिति दुनिया के लिए एक कड़ा संदेश है कि कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे, अन्यथा ग्लोबल वॉर्मिंग इंसान की आस्था और उसके धार्मिक कर्तव्यों के पालन में भी सबसे बड़ी बाधा बन जाएगी।



