Trending

ग्लोबल वॉर्मिंग का भयावह रूप: संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी

अल नीनो के कारण 2026 से 2030 तक का काल होगा इतिहास में सबसे गर्म

संयुक्त राष्ट्र (UN) ने पृथ्वी के भविष्य और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को लेकर अब तक की सबसे डरावनी और गंभीर चेतावनी जारी की है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘अल नीनो’ (El Niño) के खतरनाक प्रभाव और ग्रीनहाउस गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन के कारण वर्ष 2026 से 2030 तक की 5-वर्षीय अवधि मानव इतिहास की अब तक की सबसे गर्म अवधि (Hottest Period) साबित होने जा रही है। इस चेतावनी ने पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ रहा है खतरा?
‘अल नीनो’ एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जिसके तहत प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह गर्मी वायुमंडल में फैलती है और पूरी दुनिया के मौसम चक्र को तहस-नहस कर देती है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, इस बार अल नीनो का प्रभाव सामान्य से कहीं अधिक तीव्र है। इसके साथ ही, इंसानों द्वारा कोयले, पेट्रोल और डीजल के अंधाधुंध उपयोग से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें इस गर्मी को पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर ही कैद कर रही हैं, जिससे धरती एक तपती हुई भट्टी में बदलती जा रही है।

1.5 डिग्री सेल्सियस की लक्ष्मण रेखा पार होने का डर
वर्ष 2015 के ऐतिहासिक पेरिस समझौते में दुनिया के सभी देशों ने संकल्प लिया था कि वे वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 1.5°C से अधिक नहीं बढ़ने देंगे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस रिपोर्ट को पेश करते हुए बेहद निराशा व्यक्त की है।

वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, इस बात की 86 प्रतिशत संभावना है कि 2026 से 2030 के बीच कम से कम एक वर्ष ऐसा होगा जो इस 1.5°C की सुरक्षित सीमा को पूरी तरह पार कर जाएगा। यह पृथ्वी की पारिस्थितिकी (Ecosystem) के लिए एक ऐसा ‘टर्निंग पॉइंट’ (Turning Point) हो सकता है, जिसके बाद के नुकसान की भरपाई करना कभी संभव नहीं होगा।

मानवता पर होने वाले विनाशकारी प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र ने इस 5-वर्षीय गर्म कालखंड के दौरान होने वाले कुछ बेहद विनाशकारी प्रभावों को रेखांकित किया है:

भीषण हीटवेव (Severe Heatwaves): भारत, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व के देशों में गर्मियों के दौरान तापमान 50 से 52 डिग्री सेल्सियस के सामान्य स्तर को पार कर जाएगा, जिससे लाखों लोगों के स्वास्थ्य और जीवन पर सीधा संकट आएगा।

ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना: अंटार्कटिका और हिमालय के ग्लेशियर अकल्पनीय गति से पिघलेंगे, जिससे तटीय शहरों (जैसे मुंबई, न्यूयॉर्क और शंघाई) के समुद्र में डूबने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

कृषि और खाद्य संकट: मौसम के इस असंतुलन से कहीं भयंकर सूखा पड़ेगा तो कहीं अप्रत्याशित बाढ़ आएगी। इससे वैश्विक कृषि उत्पादन (Agriculture) बुरी तरह प्रभावित होगा, जिससे दुनिया भर में भुखमरी और अनाज का संकट गहरा सकता है।

अब नहीं संभले तो कभी नहीं
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट दुनिया के अमीर और औद्योगिक देशों के मुंह पर एक करारा तमाचा है, जो जलवायु परिवर्तन के फंड (Climate Finance) को लेकर केवल खोखले वादे करते आए हैं। गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि हम प्रकृति के साथ एक आत्मघाती खेल खेल रहे हैं। यदि दुनिया की महाशक्तियों ने तुरंत कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर रुख नहीं किया, तो 2030 तक हमारी यह खूबसूरत पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों के रहने लायक नहीं बचेगी। समय तेजी से हाथ से निकल रहा है, और यह चेतावनी हमारे लिए अंतिम खतरे की घंटी है।

Related Articles

Back to top button