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जहां तालियां थम जाती हैं: भारत के अन्य खेलों की अनकही कहानी

भारत खेलों के क्षेत्र में वर्षों से कुछ यादगार पलों का जश्न मनाने तक ही सीमित रहा है और यहां खेल संस्कृति का वास्तविक विकास अभी भी दूर की कौड़ी बना हुआ है। कभी ओलंपिक पदक, कभी ऐतिहासिक विश्व खिताब, तो कभी किसी दूर देश के मैदान में गूंजता राष्ट्रगान कुछ क्षणों के लिए लाखों लोगों को एकजुट कर देता है, लेकिन जल्द ही तालियां थम जाती हैं।

इसके बाद एक बार फिर सबकी नजरें क्रिकेट पर टिक जाती हैं। आईपीएल की नीलामी, प्रायोजन की होड़ और उससे जुड़ी चर्चाएं सुर्खियों में छा जाती हैं। वहीं अन्य खेलों के खिलाड़ी चुपचाप पहचान, सम्मान और अक्सर बुनियादी आर्थिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करते रहते हैं। हाल के दिनों में यह कड़वी सच्चाई फिर सामने आई है। भारत की स्टार बैडमिंटन जोड़ी सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी ने वैश्विक स्तर पर वर्षों तक सफलता हासिल करने के बावजूद देश में बैडमिंटन उपलब्धियों को पर्याप्त सम्मान और चर्चा न मिलने पर निराशा जताई।

इसके कुछ समय बाद शतरंज ग्रैंडमास्टर अभिजीत गुप्ता ने खुलासा किया कि एक आयोजक ने उनकी पुरस्कार राशि के भुगतान में देरी की। यहां तक कि राष्ट्रीय महासंघ ने भी शुरुआत में इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। इसी वर्ष जनवरी में ग्रेटर नोएडा में आयोजित राष्ट्रीय बैडमिंटन प्रतियोगिता के दौरान खिलाड़ियों को फर्श पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि महासंघ ने समय पर भुगतान नहीं किया था। राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता के दौरान गोंडा में भी खिलाड़ियों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल सकीं।

साभार : गूगल

ये अलग-अलग खेलों की अलग-अलग घटनाएं भर नहीं हैं। ये कुछ छिटपुट मामले नहीं, बल्कि उस व्यापक खेल संस्कृति के अभाव के संकेत हैं जिसमें क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ियों को केवल अस्थायी नायक माना जाता है।

यह सच है कि भारत ने खेलों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकार समर्थित योजनाएं जैसे टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टीओपीएस), टारगेट एशियाई खेल ग्रुप (टीएजीजी) और एसीटीसी कोष ने खिलाड़ियों की तैयारियों में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। आज शीर्ष खिलाड़ी फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और विदेशी कोच के साथ यात्रा करते हैं। एक दशक पहले ऐसी सुविधाएं बहुत कम खिलाड़ियों को उपलब्ध थीं।

लेकिन केवल कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों के दम पर कोई देश खेल महाशक्ति नहीं बन सकता। इसके लिए ऐसे मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत होती है जो हर खेल में प्रतिभाओं की पहचान करे, उन्हें आगे बढ़ाए और चैंपियन बनने से पहले तथा पदक जीतने के बाद भी लगातार सहयोग देता रहे। भारत में अभी इस तरह के व्यापक खेल पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव है।

चीन और अमेरिका जैसे देशों के ओलंपिक में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन का कारण वहां की मजबूत और व्यवस्थित खेल प्रणाली है, जो खिलाड़ियों और खेलों दोनों को निरंतर सहयोग देती है। भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी को समझना मुश्किल नहीं है। क्रिकेट ने शुरुआती दौर में ही टेलीविजन पर मजबूत पकड़ बना ली थी। इस खेल ने कई बड़ी हस्तियों को जन्म दिया और यह व्यावसायिक रूप से बेहद आकर्षक बन गया।

आईपीएल ने क्रिकेटरों को सुपरस्टार बना दिया और क्रिकेट को मनोरंजन के उस स्तर तक पहुंचा दिया जिसकी बराबरी अब तक कोई अन्य भारतीय खेल महासंघ नहीं कर पाया है। क्रिकेट भारत का प्रमुख खेल इसलिए बन गया क्योंकि उसने ऐसा मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया, जैसा अन्य खेल नहीं कर सके। आज एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार क्रिकेट के जरिए बेहतर भविष्य और स्थायी आजीविका की कल्पना कर सकता है, लेकिन अन्य खेलों के बारे में ऐसा विश्वास अभी भी नहीं बन पाया है।

एक बैडमिंटन खिलाड़ी सुपर 1000 का खिताब जीत सकता है, कोई पहलवान विश्व चैंपियन बन सकता है और कोई शतरंज खिलाड़ी दिग्गज ग्रैंडमास्टर्स को हरा सकता है, लेकिन बड़े टूर्नामेंटों के बाहर उन्हें शायद ही कभी व्यापक चर्चा मिलती है।

कई खेल महासंघ अपनी मार्केटिंग और प्रचार-प्रसार सही ढंग से नहीं कर पाते। वे प्रशंसकों को जोड़ने में असफल रहते हैं। कई संघ मुकदमों में उलझे रहते हैं और उनका संचालन अदालत द्वारा नियुक्त तदर्थ समितियां करती हैं। भारत का कॉर्पोरेट जगत भी अब तक अधिकांश ओलंपिक खेलों को दीर्घकालिक निवेश के अवसर के बजाय दान या सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में ही देखता है। ऐसे माहौल में परिवार अपने बच्चों का भविष्य खेलों के भरोसे दांव पर लगाने से हिचकिचाते हैं। सच तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था ने उन्हें ऐसा न करने के पर्याप्त कारण भी दिए हैं।

यदि भारत वास्तव में खेल महाशक्ति बनना चाहता है, तो देश को केवल बड़े बजट की नहीं, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है। सबसे पहले भारत को खेल साक्षरता बढ़ाने की जरूरत है। स्कूलों में शारीरिक शिक्षा को गणित और विज्ञान जितनी ही गंभीरता और महत्व दिया जाना चाहिए। दूसरा, भारत को जमीनी स्तर पर अधिक और बेहतर प्रतियोगिताओं की जरूरत है। तीसरा, खेल संघों को अधिक पेशेवर, पारदर्शी और जवाबदेह बनना होगा। और चौथा, भारत को एक बेहतर और संतुलित खेल मीडिया संस्कृति विकसित करनी होगी।

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