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( जयंती विशेष) वो भारतीय अभिनेत्री जो अपने एक्टिंग के दम पर अभिनेताओं से भी ज्यादा लेती थी फीस

भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की एक ऐसी अभिनेत्री, जिन्होंने अपनी रहस्यमयी मुस्कान और दमदार अभिनय से दर्शकों के दिलों पर दशकों तक राज किया। महान अभिनेत्री सुचित्रा सेन की आज बर्थ एनिवर्सी है।
बंगाली सिनेमा से लेकर हिंदी सिनेमा की ऊंचाइयों तक, उनका सफर हर कलाकार के लिए प्रेरणादायी है। वह ऐसी पहली बंगाली अभिनेत्री बनी जिन्हें किसी अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘सर्वोतम अभिनेत्री’ का पुरस्कार मिला हो। सुचित्रा सेन ने 50 के दशक में अपनी खूबसूरती से सबके दिलों पर राज किया। ऐसा कहा जाता है कि एक समय ऐसा आया कि वे किसी बड़े हीरो से ज्यादा फीस लेने लगी। उन्होंने बड़े-बड़े हीरो और फिल्म निर्देशकों की फिल्मों को ठुकराना शुरू कर दिया। सुचित्रा के बारे में कहा जाता है कि वो फिल्मों के सेलेक्शन के मामले में बहुत सतर्क रहती थीं और इसी वजह से उन्होंने कई बड़ी फिल्में ठुकरा दी।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि :

सुचित्रा सेन का जन्म 6 अप्रैल 1931 को अविभाजित भारत के बंगाल (अब बांग्लादेश) के पबना जिले में हुआ था। उनके बचपन का नाम रमा दासगुप्ता था। उनके पिता का नाम करुणामय दासगुप्ता था, जो एक स्थानीय स्कूल में हेडमास्टर थे, और माता का नाम इन्दिरा देवी था। उनकी शिक्षा-दीक्षा पबना में ही हुई। मध्यमवर्गीय मूल्यों और सांस्कृतिक परिवेश ने उनके व्यक्तित्व को शुरू से ही गढ़ा। सुचित्रा सेन का विवाह कम उम्र में ही दीबानाथ सेन से हो गया था, लेकिन उनकी प्रतिभा को पर्दे पर आना ही था। उन्होंने 1952 में फिल्म ‘शेष कोथाय’ से अपने करियर की शुरुआत की। हालांकि, उनकी असली पहचान महान अभिनेता उत्तम कुमार के साथ बनी। इस जोड़ी ने बंगाली सिनेमा को ‘साढ़े चौहत्तर’, ‘अग्निपरीक्षा’ और ‘सप्तपदी’ जैसी कालजयी फिल्में दीं। 1952 में सुचित्रा सेन ने एक्ट्रेस बनने के लिए फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा और बांग्ला फिल्म ‘शेष कोथा’ में काम किया हालांकि फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। 1952 में प्रदर्शित बांग्ला फिल्म ‘सारे चतुर’ उनकी पहली फिल्म थी इसमें उनके साथ उत्तम कुमार थे। 1962 में ‘बिपाशा’ में काम करने के लिए उन्हें एक लाख रुपए मिले थे जब कि हीरो उत्तम कुमार को सिर्फ अस्सी हजार रुपयों से संतोष करना पड़ा था। हिंदी सिनेमा में उन्होंने बहुत कम फिल्में कीं, लेकिन जो भी कीं, वे इतिहास बन गईं। ‘देवदास’ (1955) में उनकी ‘पारो’ की भूमिका ने उन्हें अमर कर दिया। वहीं, फिल्म आंधी’ (1975) में एक राजनेता का उनका किरदार आज भी सशक्त अभिनय की मिसाल माना जाता है। बंगाली में सप्तपदी, हारानो सुर, दीप जेले जाई, उत्तर फाल्गुनी, सात पाके बांधा और हिंदी में देवदास, आंधी, मुसाफिर, बम्बई का बाबू, ममता जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। उनकी प्रतिभा को देश-दुनिया ने सराहा, 1963 में ‘सात पाके बांधा’ के लिए उन्हें मॉस्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। वह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री थीं।
भारत सरकार ने 1972 में उन्हें कला के क्षेत्र में योगदान के लिए ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया। उन्हें फिल्म ‘ममता’ और ‘आंधी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के नामांकन और सम्मान प्राप्त हुए।

राज कपूर को नहीं पसंद करती थीं सुचित्रा सेन :

सुचित्रा को लेकर एक किस्सा बहुत चर्चित था, जिसमें उन्हें राज कपूर साहब इसलिए पसंद नहीं थे क्योंकि उनके गुलदस्ता देने का तरीका उन्हें ठीक नहीं लगता था। वे राज कपूर को एक इंसान के तौर पर पसंद नहीं करती थीं और इसलिए कभी उनके साथ फिल्म नहीं की। सुचित्रा सेन बड़े से बड़े फिल्मकारों के साथ काम करने का प्रस्ताव ठुकराती रहीं। सुचित्रा ने राज कपूर की एक फिल्म में काम करने का प्रस्ताव इसलिए ठुकराया क्योंकि राज कपूर द्वारा झुककर फूल देने का तरीका उन्हें पसंद नहीं आया था। यही नहीं सुचित्रा ने सत्यजीत राय की फिल्म को भी मना कर दिया था। सत्यजीत राय ने फिल्म ‘देवी चौधरानी’ बनाने का विचार ही छोड़ दिया। 2005 में उन्होंने दादासाहेब फाल्के पुरस्कार का प्रस्ताव महज इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि इसके लिए उन्हें कोलकाता छोड़कर दिल्ली जाना पड़ता। वो अपनी शर्तों पर काम करती रहीं।

सुचित्रा सेन की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपने करियर के शिखर पर रहने के बाद अचानक खुद को चकाचौंध से दूर कर लिया। वह लगभग तीन दशकों तक ‘एकांतवास’ में रहीं और कभी किसी सार्वजनिक समारोह में नहीं दिखीं। उनकी इसी रहस्यमयी सादगी ने उन्हें ‘भारत की ग्रेटा गार्बो’ बना दिया। आज वह शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फ़िल्में और उनकी आँखों की वह कशिश हमेशा सिने-प्रेमियों के जेहन में जिंदा रहेगी। भारतीय सिनेमा की इस महान नायिका को शत-शत नमन।

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