भारतीय विचारधारा निरंतर ज्ञान प्रवाह, मातृभाषा में शिक्षा आवश्यक : धर्मेंद्र प्रधान

मैसूर : केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारतीय विचारधारा हजारों वर्षों से निरंतर प्रवाहित होने वाला ज्ञान का स्रोत है, जो समय के अनुसार अपना स्वरूप बदलते हुए आगे बढ़ती रही है। प्रज्ञा प्रवाह कर्नाटक द्वारा मैसूर स्थित कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित ‘एकात्म मानव दर्शन: भारत की विश्वदृष्टि’ अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन विशेष संवाद सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता का अभिन्न हिस्सा है और आज भी समयानुसार अपने स्वरूप में परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ रहा है। किसी भी सिद्धांत का एक व्यावहारिक रूप होता है, इसलिए भारतीय विश्वदृष्टि को आम लोगों तक सरल भाषा में पहुंचाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक नीति पर आज भले ही व्यापक चर्चा हो रही हो, लेकिन मैसूर रियासत में सदियों पहले ही इन विषयों पर विचार कर उन्हें क्रियान्वित किया गया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन ने मानव की समग्रता को रेखांकित किया है और उसी आधार पर केंद्र सरकार ने कई योजनाएँ तैयार की हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘2047 तक विकसित भारत’ के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसे प्राप्त करने के लिए भारतीय चिंतन को पुनर्जीवित करना आवश्यक है।
औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी उसकी मानसिकता बनी रही, जिससे देश को नुकसान हुआ है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था डिग्री और प्रमाणपत्र तक सीमित हो गई है, जिसे भारतीय विचारधारा के आधार पर पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मातृभाषा में शिक्षा देने से विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता को बढ़ावा मिलता है। इसलिए शिक्षा प्रणाली में बुनियादी बदलाव लाना जरूरी है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक समय के अनुरूप ढालकर आम लोगों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।



