संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कठोर संदेश: ईरान के साथ समझौते और उसे 'नरक में धकेलने' के बीच चयन का समय
अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के दस मिनट के भीतर ही ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने किया सभा का बहिष्कार; राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भी रहे अनुपस्थित द इंडियन व्यू टीमन्यूयॉर्क अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक भू-राजनीति के सबसे…

अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के दस मिनट के भीतर ही ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने किया सभा का बहिष्कार; राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भी रहे अनुपस्थित
द इंडियन व्यू टीम
न्यूयॉर्क
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक भू-राजनीति के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण मंच, संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार फिर से संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच का गहरा तनाव और अविश्वास पूरी दुनिया के सामने खुलकर प्रदर्शित हुआ है। मध्य पूर्व में पहले से ही व्याप्त भयंकर अशांति और संघर्ष के बीच, अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व ने ईरान को लेकर एक अत्यंत आक्रामक और चेतावनी भरा रुख अपनाया है, जिसने वैश्विक शांति के पैरोकारों की चिंताएं अत्यधिक बढ़ा दी हैं। प्राप्त आधिकारिक समाचार और कूटनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन में बहुत ही कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि वे ईरान के साथ किसी प्रकार के सौदे (समझौते) और उसे 'नरक में' धकेलने के बीच कड़ा निर्णय ले रहे हैं।
कूटनीतिक भाषा में किसी संप्रभु राष्ट्र के लिए 'नरक' जैसे उग्र और अमर्यादित शब्द का प्रयोग करना यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्र में उसके द्वारा समर्थित सशस्त्र समूहों की गतिविधियों को लेकर किस हद तक आक्रामक नीति अपनाने की तैयारी कर रहा है। बाइस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को न्यूयॉर्क शहर में स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इक्यासीवीं (81st) संयुक्त राष्ट्र महासभा के ऐतिहासिक सत्र को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कड़ा और सीधा संदेश दिया। संलग्न तस्वीर में अमेरिकी राष्ट्रपति को संयुक्त राष्ट्र के मंच से अत्यंत गंभीर और दृढ़ मुद्रा में अपना भाषण देते हुए देखा जा सकता है।
इस अत्यंत आक्रामक भाषण की तीव्र प्रतिक्रिया भी उसी क्षण और उसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देखने को मिली। जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के विरुद्ध अपने प्रहार आरंभ किए, ईरानी राजनयिकों ने भी अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के मात्र दस मिनट के भीतर ही वहां उपस्थित ईरानी प्रतिनिधिमंडल महासभा के कक्ष से बाहर चला गया और उन्होंने भाषण का पूर्ण बहिष्कार कर दिया। यह कूटनीतिक बहिष्कार दोनों देशों के बीच संवाद की पूर्ण विफलता और चरम कड़वाहट का सीधा और प्रत्यक्ष प्रतीक है।
इस विवाद का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि ईरान का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भी इस भाषण के दौरान जानबूझकर वहां से नदारद रहा। यद्यपि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और उनके विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए विशेष रूप से न्यूयॉर्क में ही उपस्थित हैं, परंतु वे अमेरिकी राष्ट्रपति के इस भाषण के लिए महासभा के विशाल कक्ष में नहीं पहुंचे। उनकी यह रणनीतिक अनुपस्थिति इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ईरान अमेरिकी धमकियों के आगे झुकने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है और वह अमेरिका के एकतरफा बयानों को कोई कूटनीतिक महत्व नहीं देना चाहता।
संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच का मूल उद्देश्य राष्ट्रों के बीच संवाद, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और कूटनीतिक समाधान खोजना है। परंतु, जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और मध्य पूर्व का एक प्रमुख राष्ट्र इसी मंच का उपयोग एक-दूसरे को धमकियां देने और बहिष्कार करने के लिए करते हैं, तो इससे वैश्विक कूटनीति की प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है। यह तनावपूर्ण घटनाक्रम इस बात का प्रबल संकेत है कि आगामी समय में वाशिंगटन और तेहरान के मध्य आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य तनाव और कूटनीतिक युद्ध अपने चरम पर पहुंच सकते हैं।
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