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जन-विरोध के आगे झुकी उत्तराखंड सरकार: भानियावाला-ऋषिकेश सड़क परियोजना के लिए 4,000 पेड़ काटने के फैसले पर लगाई रोक

विवेक ओझा/ देहरादून: 'चिपको आंदोलन' की जन्मस्थली रहे उत्तराखंड में एक बार फिर पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने पेड़ों को बचाने की बड़ी लड़ाई जीत ली है। भानियावाला से ऋषिकेश तक प्रस्तावित फोर-लेन सड़क चौड़ीकरण…

Ragwendra P Singh
July 20, 2026
2 min read
जन-विरोध के आगे झुकी उत्तराखंड सरकार: भानियावाला-ऋषिकेश सड़क परियोजना के लिए 4,000 पेड़ काटने के फैसले पर लगाई रोक

विवेक ओझा/  देहरादून: 'चिपको आंदोलन' की जन्मस्थली रहे उत्तराखंड में एक बार फिर पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने पेड़ों को बचाने की बड़ी लड़ाई जीत ली है। भानियावाला से ऋषिकेश तक प्रस्तावित फोर-लेन सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए थानो वन क्षेत्र के लगभग 4,000 पेड़ों को काटने के फैसले पर राज्य सरकार ने आखिरकार रोक लगा दी है। जनता के भारी दबाव और लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को इस परियोजना के लिए नया 'अल्टरनेटिव अलाइनमेंट' (वैकल्पिक मार्ग) तलाशने के सख्त निर्देश दिए हैं।

थानो का जंगल और नया चिपको


देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर स्थित थानो का जंगल अपनी दुर्लभ साल (Sal) प्रजाति के पेड़ों और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। जब लोक निर्माण विभाग (PWD) और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने जॉलीग्रांट एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी सुधारने के नाम पर इन 4,000 से अधिक पुराने पेड़ों पर लाल निशान लगाए, तो स्थानीय लोग भड़क उठे। हजारों की संख्या में युवा, महिलाएं और पर्यावरण कार्यकर्ता पेड़ों से चिपक कर खड़े हो गए। "विकास चाहिए, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं" जैसे नारों से पूरा दून घाटी गूंज उठा था।

मुख्यमंत्री का दखल और नया निर्देश


लगातार 10 दिनों तक चले धरना-प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर चले राष्ट्रव्यापी अभियान के बाद राज्य सरकार हरकत में आई। मुख्यमंत्री ने वन विभाग और NHAI के शीर्ष अधिकारियों के साथ आपात बैठक की। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड की पहचान उसकी हरियाली से है और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पर्यावरण से समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि सड़क का चौड़ीकरण इस तरह से डिजाइन किया जाए कि जंगल को कम से कम नुकसान हो, भले ही इसके लिए फ्लाईओवर या एलिवेटेड रोड का निर्माण क्यों न करना पड़े।

कार्यकर्ताओं ने इसे 'लोकतंत्र और प्रकृति की जीत' बताया है। हालांकि, उनका कहना है कि जब तक इस रोक का आधिकारिक सरकारी आदेश (Government Order) लिखित रूप में जारी नहीं हो जाता, वे जंगल की निगरानी करते रहेंगे। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यदि जनता एकजुट हो जाए, तो बड़े से बड़े प्रशासनिक फैसलों को भी जनहित और प्रकृति के हित में पलटा जा सकता है।

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