उत्तर प्रदेश का ‘वूमेन इकोनॉमिक एंपावरमेंट इंडेक्स 2.0’
महिलाओं के वास्तविक लाभ का कैनवास

राघवेंद्र प्रताप सिंह : भारत की 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा महिला श्रम बल की भागीदारी के बिना अधूरी है। देश की GDP में महिलाओं का योगदान फिलहाल केवल 18 प्रतिशत है और लगभग 19.6 करोड़ रोजगार-योग्य महिलाएं सक्रिय श्रम बल से बाहर हैं। उत्तर प्रदेश, जो देश की सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, इस चुनौती के केंद्र में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘वूमेन इकोनॉमिक एंपावरमेंट इंडेक्स (WEE) 2.0’ नामक एक अनोखी पहल शुरू की है। नियोजन विभाग द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए तैयार किया गया यह सूचकांक केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक ऐसा उपकरण है जो यह मापता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में महिलाओं तक किस स्तर तक पहुंच रहा है और उनके जीवन में क्या गुणात्मक बदलाव ला रहा है। भारत में अपनी तरह का पहला जिला-स्तरीय उपकरण होने के नाते, यह सूचकांक नीति-निर्माण को डेटा-आधारित और लक्षित बनाकर महिला सशक्तीकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को एक नया आयाम दे रहा है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और सरकारी योजनाओं में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए योगी सरकार एक अनोखी पहल कर रही है। राज्य के नियोजन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 'वूमेन इकोनॉमिक एंपावरमेंट इंडेक्स 2.0' तैयार किया है। इस इंडेक्स के जरिए महिलाओं से जुड़ी विभिन्न योजनाओं का आंकड़ों के आधार पर जिला स्तर पर आकलन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 8 जुलाई 2025 को वूमेन इकोनॉमिक एंपावरमेंट इंडेक्स के पहले संस्करण की समीक्षा के दौरान सभी विभागीय योजनाओं में महिलाओं की 30 प्रतिशत भागीदारी का लक्ष्य निर्धारित करने के निर्देश दिए थे। साथ ही, सबसे कम प्रदर्शन वाले पांच जिलों पर विशेष अभियान चलाने और सभी विभागों को जेंडर एक्शन प्लान तैयार कर लागू करने को कहा गया था।
इंडेक्स में शानदार प्रदर्शन करने वाले जिलों को 'चैंपियन' श्रेणी में रखा गया है। इन जिलों में लखनऊ, कानपुर नगर, वाराणसी, झांसी, सुल्तानपुर, गौतम बुद्ध नगर, प्रयागराज, अयोध्या, सोनभद्र, रायबरेली, गोरखपुर, देवरिया, अंबेडकर नगर, आगरा और गाजियाबाद शामिल हैं। इन जिलों ने सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और मजबूत संस्थागत सहयोग के कारण बेहतरीन परिणाम दिखाए हैं। इंडेक्स के अनुसार, महिलाओं की उद्यमिता में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और अधिक से अधिक महिलाएं पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़कर स्वरोजगार और नेतृत्व अपना रही हैं। 'मिशन शक्ति' जैसे अभियानों ने महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता को मजबूत किया है, जबकि सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं को ड्राइवर और कंडक्टर के रूप में भर्ती करने की योजनाओं ने उनकी गतिशीलता और आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ाया है।
49 संकेतक और 15 विभागों से जुटाया जा रहा डेटा :
इंडेक्स को तैयार करने के लिए 15 विभागों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कुल 49 संकेतक निर्धारित किए गए हैं। इसका मकसद सिर्फ योजनाओं के क्रियान्वयन का आंकड़ा जुटाना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि उनका लाभ महिलाओं तक किस स्तर तक पहुंच रहा है। इंडेक्स में महिलाओं से जुड़ी पांच प्रमुख श्रेणियों को अलग-अलग भारांक (वेटेज) दिया गया है:
* शिक्षा एवं कौशल विकास: 22.4%
* उद्यमिता: 22.1%
* रोजगार: 21.9%
* आजीविका: 17.4%
* आवागमन, सुरक्षा एवं समावेशी बुनियादी ढांचा: 16.1%
सूचकांक का तकनीकी वास्तुशिल्प: 49 संकेतक क्या मापते हैं?
‘WEE Index 2.0’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापक और सूक्ष्म संरचना है। यह सूचकांक राज्य के सभी 75 जिलों का मूल्यांकन पांच प्रमुख श्रेणियों के आधार पर करता है, जिन्हें अलग-अलग भारांक (वेटेज) दिया गया है। यह भारांक इस बात का संकेत देते हैं कि सरकार महिला सशक्तीकरण के किस पहलू को कितनी प्राथमिकता दे रही है। ये पांच श्रेणियां और उनका भारांक इस प्रकार हैं:
- शिक्षा एवं कौशल विकास (22.4%): यह सबसे अधिक भारांक वाली श्रेणी है, जो यह दर्शाती है कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए शिक्षा और कौशल को सबसे बुनियादी आधार माना जा रहा है।
- उद्यमिता (22.1%): यह श्रेणी महिलाओं को नौकरीपेशा से आगे बढ़कर स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने और आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम बनाने पर केंद्रित है।
- रोजगार (21.9%): इसमें विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी और उन्हें सुरक्षित एवं सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।
- आजीविका (17.4%): यह श्रेणी उन महिलाओं के लिए है जो स्वरोजगार या छोटे पैमाने के कार्यों से अपनी आजीविका चलाती हैं, जैसे स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं।
- आवागमन, सुरक्षा एवं समावेशी बुनियादी ढांचा (16.1%): यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को सुरक्षित आवागमन और कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, क्योंकि बिना सुरक्षा और गतिशीलता के आर्थिक सशक्तीकरण अधूरा है।
इन श्रेणियों में प्रदर्शन मापने के लिए 15 विभागों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कुल 49 संकेतक निर्धारित किए गए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सूचकांक केवल ‘लाभार्थियों की संख्या’ नहीं गिनता, बल्कि ‘ड्रॉप-ऑफ’ के बिंदुओं को ट्रैक करता है—जैसे स्कूल से कौशल प्रशिक्षण तक, कौशल से रोजगार तक, और उद्यमिता से ऋण तक। इन संकेतकों में ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट), मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना, विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना, पीएम स्वनिधि, स्वयं सहायता समूहों, आईटीआई, पॉलिटेक्निक और रोजगार मेलों में महिलाओं की भागीदारी का आकलन किया जा रहा है। यह सूचकांक लिंग-विभाजित डेटा एकत्र करता है, जिससे पारंपरिक आंकड़ों में छिपी महत्वपूर्ण कमियों को उजागर किया जा सके।
WEE 1.0 से 2.0 तक: निगरानी से कार्रवाई की ओर
यह समझना आवश्यक है कि WEE Index 2.0 अपने पहले संस्करण (1.0) से कैसे आगे निकलता है। जुलाई 2025 में जारी पहले संस्करण में लखनऊ, कानपुर नगर और वाराणसी शीर्ष प्रदर्शन करने वाले जिलों में थे, जबकि श्रावस्ती, संभल और महोबा जैसे जिले पिछड़े थे। लेकिन दूसरा संस्करण अब ‘सिर्फ रिपोर्ट’ नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसे CM कंट्रोल रूम से जोड़कर रियल-टाइम मॉनिटरिंग शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सूचकांक “केवल आंकड़ों के मूल्यांकन तक सीमित न रहे” और प्रत्येक विभाग जिलेवार जेंडर एक्शन प्लान तैयार करे, जिसमें कमियों के कारण, हस्तक्षेप, मापनीय लक्ष्य, समय-सीमा और अधिकारी की जवाबदेही स्पष्ट हो। इसके अलावा, प्रत्येक जिले में ‘पुनः नामांकन इकाई’ (Re-enrolment Unit) स्थापित करने की योजना है ताकि पढ़ाई या प्रशिक्षण बीच में छोड़ चुकी महिलाओं को फिर से जोड़ा जा सके। यह सूचकांक को एक जवाबदेही-आधारित शासन उपकरण में बदल देता है।
सूचकांक को ‘फीड’ करने वाली योजनाएँ: आंकड़ों के पीछे की जमीनी कहानी
यह समझने के लिए कि WEE Index के आँकड़े कहाँ से आते हैं, तीन प्रमुख योजनाओं पर गौर करना जरूरी है, जो सूचकांक के विभिन्न आयामों को सीधे प्रभावित करती हैं।
मिशन शक्ति: यह केवल ‘महिला सुरक्षा अभियान’ नहीं है। इसके पांचवें चरण (2025-26) में ‘महिला स्वास्थ्य लाइन’ जैसी नई पहल जोड़ी गई है, जो 1090 हेल्पलाइन के मॉडल पर आधारित है। पिंक बूथ (जहाँ 24 घंटे महिला पुलिसकर्मी तैनात रहती हैं), 1090 वीमेन पावर लाइन और 181 हेल्पलाइन जैसे तंत्र सक्रिय हैं। 1090 हेल्पलाइन अब तक 7.78 लाख से अधिक मामलों का समाधान कर चुकी है और राज्य में 100 पिंक पुलिस बूथ स्थापित किए गए हैं। सूचकांक के ‘सुरक्षा और आवागमन’ आयाम का डेटा इन्हीं तंत्रों की कार्यप्रणाली से आता है।
ODOP और महिला उद्यमिता: सूचकांक में उद्यमिता को 22.1% भारांक मिला है। ODOP के तहत महिला कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक पहुँचाने का दावा किया जाता है। वाराणसी में 1 लाख से अधिक कारीगर ODOP से जुड़े हैं, जिनमें लगभग 25% महिलाएं हैं, और इन उत्पादों का सालाना कारोबार लगभग 1,500 करोड़ रुपये है। महिलाओं को ई-कॉमर्स प्रशिक्षण दिया जा रहा है—उदाहरण के लिए, वाराणसी में 150 महिला उद्यमियों को मुफ्त ई-कॉमर्स प्रशिक्षण दिया गया। लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण तनाव भी उभरता है: सूचकांक का ही निष्कर्ष है कि कौशल कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी 50% से अधिक है, लेकिन पंजीकृत उद्यमियों में उनका अनुपात बहुत कम है, और ऋण तक उनकी पहुँच और भी सीमित है। इसका मतलब है कि ODOP जैसी योजनाएँ ‘दृश्यता’ तो बढ़ा रही हैं, लेकिन ‘वित्तीय गहराई’ अभी भी एक बाधा है।
लखपति दीदी और स्वयं सहायता समूह: ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को रिवॉल्विंग फंड उपलब्ध कराने में महिलाओं की भागीदारी 2023-24 के 38% से बढ़कर 2025-26 में 65.3% हो गई है। ‘एक करोड़ लखपति दीदी’ बनाने की कार्ययोजना इसी दिशा में है। सूचकांक का ‘आजीविका’ आयाम (17.4% भारांक) इसी तरह के संकेतकों पर आधारित है। इसे जोड़ने से यह स्पष्ट होता है कि सूचकांक ‘खाली आंकड़ों’ का संग्रह नहीं, बल्कि चालू योजनाओं के प्रभाव का आकलन है।
शुरुआती संकेत: क्या बदलाव हो रहा है?
सूचकांक के आंकड़े कुछ सकारात्मक बदलावों की ओर इशारा करते हैं। उत्तर प्रदेश में महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) 2017-18 के 14 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 36 प्रतिशत हो गई है। हालांकि, यह अभी भी भारत के 45 प्रतिशत के औसत से कम है, लेकिन 2017-18 में यूपी की दर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे थी। स्वयं सहायता समूहों और उद्यमिता में भी विस्तार हुआ है—उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत महिला उद्यमियों की संख्या 2023-24 के 1.87 लाख से बढ़कर 2025-26 में 2.90 लाख हो गई है। कौशल विकास में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है—ओडीओपी प्रशिक्षण में 58.2% से 63.1% और विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना में 49.5% से 63.3% तक।
लेकिन इस वृद्धि को लेकर विशेषज्ञों की एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। The Wire और The Statesman जैसे विश्लेषण बताते हैं कि FLFPR का बढ़ना अपने आप में ‘अच्छी नौकरी’ का पर्याय नहीं है। बड़ी संख्या में महिलाएं अभी भी कम-वेतन वाले, अनौपचारिक या स्वरोजगार की सीमांत श्रेणियों में हैं, और नियमित वेतन वाली नौकरियों में गिरावट देखी गई है। कुछ शोध यह भी सुझाते हैं कि यह वृद्धि ‘आर्थिक मजबूरी’ (distress-driven) से प्रेरित हो सकती है, न कि बेहतर अवसरों से। सूचकांक का असली योगदान यही है कि वह इस अंतर को दिखाता है—वह भागीदारी दरों के साथ-साथ काम की गुणवत्ता और संरचनात्मक बाधाओं को भी रेखांकित करता है।
सीमाएँ और चुनौतियाँ: एक संतुलित मूल्यांकन
हालांकि WEE Index 2.0 एक महत्वपूर्ण कदम है, इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
डेटा की गुणवत्ता और आवृत्ति: विशेषज्ञ चेताते हैं कि लैंगिक-विभाजित डेटा अभी भी कमजोर है; जिला स्तर पर डेटा संग्रह की क्षमता असमान है, और कई विभागों के प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) में लिंग-विभाजन अनिवार्य नहीं है। इससे सूचकांक की तुलनात्मकता सीमित हो सकती है।
‘भागीदारी’ बनाम ‘गुणवत्ता’: सूचकांक मुख्य रूप से भागीदारी दरों (enrolment, participation) पर निर्भर है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, नेतृत्व में महिलाओं की हिस्सेदारी, करियर ब्रेक के बाद वापसी और पदोन्नति जैसे गहरे संकेतक अभी भी कमजोर हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सूचकांक को ‘हेडकाउंट’ से आगे बढ़कर ‘प्रतिधारण’ (retention) और ‘नेतृत्व’ को भी मापना चाहिए।
राजनीतिक अर्थ: विपक्ष का आरोप है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के सूचकांक ‘चुनावी दांव’ हो सकते हैं। हालाँकि सूचकांक की तकनीकी बनावट (49 संकेतक, 15 विभाग) इसे एक गंभीर प्रयास बनाती है, लेकिन इसका राजनीतिक उपयोग कैसे होता है—यह एक वैध सार्वजनिक बहस का विषय है। एक संतुलित विश्लेषण में इस आयाम को छोड़ना अधूरा होगा।
क्या यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए दोहराया जा सकता है?
WEE Index 2.0 का महत्व केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत में लैंगिक-संवेदी शासन (gender-responsive governance) के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ बन सकता है। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस जिला-स्तरीय मॉडल को अपनाने में रुचि दिखाई है, क्योंकि ये राज्य भी ट्रिलियन-डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ‘जेंडर डिविडेंड’ का लाभ उठाना चाहते हैं। यह सूचकांक दिखाता है कि महिला सशक्तीकरण को केवल कल्याणकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जा सकता है। बशर्ते डेटा की गुणवत्ता और जवाबदेही तंत्र मजबूत हों, यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए एक उपयोगी टेम्पलेट साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: आंकड़ों से आगे, संरचनात्मक परिवर्तन की शर्त
‘वूमेन इकोनॉमिक एंपावरमेंट इंडेक्स 2.0’ उत्तर प्रदेश के लिए एक परिवर्तनकारी उपकरण साबित हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने महिला सशक्तीकरण को ‘कल्याणकारी योजनाओं’ के दायरे से निकालकर आर्थिक नीति के केंद्र में रखा है। यह सूचकांक न केवल प्रयासों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ-साथ नीति-निर्माण में एक नई कार्य-संस्कृति को भी जन्म दे रहा है। लेकिन सूचकांक तभी सार्थक है जब जिला स्तर पर बनने वाले जेंडर एक्शन प्लान केवल कागजी औपचारिकता न हों, बल्कि बजट, भर्ती और बुनियादी ढाँचे में ठोस बदलाव लाएँ। जब राज्य की आधी आबादी आर्थिक रूप से सशक्त होगी, तभी उत्तर प्रदेश एक ट्रिलियन-डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल कर सकता है। सूचकांक का असली परीक्षण अगले दो-तीन वर्षों में होगा—क्या ‘चैंपियन’ जिलों की सफलता ‘आकांक्षी’ जिलों तक पहुँचती है, और क्या कौशल से उद्यमिता तक का पुल वास्तव में मजबूत होता है। तभी ‘नारी शक्ति’ से ‘अर्थशक्ति’ की ओर बढ़ता उत्तर प्रदेश एक आत्मनिर्भर और समावेशी भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेगा।
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