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135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू होगी

देहरादून ( ओम प्रकाश सिमल्टी) : 135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू होगी 135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू हो रही है। टूर्नामेंट के ग्रुप ई के मैच शहर में खेले जाएंगे, जिसमें मेघालय के तीन फुटबॉल…

Ragwendra P Singh
July 31, 2026
2 min read
135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू होगी

देहरादून ( ओम प्रकाश सिमल्टी) : 135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू होगी 135वीं डूरंड कप प्रतियोगिता आज शिलांग में शुरू हो रही है। टूर्नामेंट के ग्रुप ई के मैच शहर में खेले जाएंगे, जिसमें मेघालय के तीन फुटबॉल क्लब – शिलांग लाजोंग, नोंगकसेह स्पोर्ट्स एंड सोशल कल्चरल क्लब और लैंग्सनिंग फुटबॉल क्लब हिस्सा लेंगे। मुंबई फुटबॉल क्लब भी ग्रुप ई के मैचों में शामिल है।

मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा उद्घाटन समारोह में शामिल होंगे। उद्घाटन समारोह आज दोपहर 3 बजे शुरू होगा। सांस्कृतिक कार्यक्रम में फ्यूजन, मिलिट्री और पाइप बैंड की प्रस्तुतियां भी शामिल होंगी।

135वें डूरंड कप के साथ-साथ, भारतीय सशस्त्र बलों के हथियारों और उपकरणों की प्रदर्शनी भी 31 जुलाई और 3 अगस्त को सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक पोलो ग्राउंड बस पार्किंग में जनता के लिए खुली रहेगी।

आपको बता दें कि डूरंड कप केवल एक फुटबॉल टूर्नामेंट नहीं, बल्कि 138 वर्षों के इतिहास, परंपरा और भारतीय फुटबॉल की विरासत का प्रतीक है। 1888 में सैनिकों के बीच खेल भावना और अनुशासन बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू हुई यह प्रतियोगिता आज एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट बन चुकी है। तीन ट्रॉफियों की अनोखी परंपरा, ऐतिहासिक विरासत और नए खिलाड़ियों को मंच देने की पहचान इसे दुनिया के सबसे खास फुटबॉल आयोजनों में शामिल करती है।

डूरंड कप की सबसे अनूठी पहचान उसकी तीन ट्रॉफियां हैं- डूरंड कप, प्रेसिडेंट्स कप और शिमला ट्रॉफी। एक विजेता और तीन ट्रॉफियां। यह परंपरा इसे दुनिया के फुटबॉल इतिहास में अलग पहचान देती है। मानो एक जीत के साथ अतीत की विरासत, वर्तमान की उपलब्धि और भविष्य की जिम्मेदारी- तीनों विजेता के हाथों में आ जाती हों।

डूरंड कप की शुरुआत कैसे हुई थी?


1888 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड की पहल पर शुरू हुई इस प्रतियोगिता का उद्देश्य सैनिकों के बीच अनुशासन, टीम भावना और सौहार्द को बढ़ावा देना था। शुरुआती वर्षों में सैन्य रेजीमेंटों की टीमें इसमें हिस्सा लेती थीं। शिमला का अन्नाडेल मैदान इस ऐतिहासिक यात्रा का पहला पड़ाव बना। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह प्रतियोगिता आगे चलकर एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट के रूप में पहचानी जाएगी।

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