खिलाड़ी से गुरु तक, भारतीय निशानेबाजी के स्तंभ थे जसपाल राणा
भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज खिलाड़ी और प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा का निधन हो गया। जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित एक प्रतियोगिता से लौटने के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके निधन से भारतीय खेल जगत, विशेषकर निशानेबाजी समुदाय को गहरा आघात पहुंचा है।
खिलाड़ी और कोच, दोनों ही भूमिकाओं में जसपाल राणा ने भारतीय निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हुआ था। बचपन से ही उन्हें निशानेबाजी में गहरी रुचि थी। उनके पिता नारायण राणा, जो स्वयं सेना के पूर्व अधिकारी थे, उनके पहले कोच बने। मात्र 12 वर्ष की आयु में ही जसपाल ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था।
1988 में राष्ट्रीय निशानेबाजी चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीतकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। इसके बाद 1994 में इटली में आयोजित जूनियर विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में उनके शानदार प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

जसपाल राणा ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि वह ओलंपिक में पदक जीतने में सफल नहीं हो सके, लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों में उनका प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा। उन्होंने चार राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेते हुए कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण पदक शामिल थे। 2002 में मैनचेस्टर में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने अकेले छह पदक अपने नाम किए।
वर्ष 2006 के दोहा एशियाई खेलों में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में 590 अंक हासिल कर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की।
एक सफल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने के बाद जसपाल राणा ने कोचिंग के क्षेत्र में भी अपनी अलग छाप छोड़ी। उन्होंने अनेक युवा निशानेबाजों को प्रशिक्षित किया और भारतीय शूटिंग को नई पीढ़ी के कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए। उनकी देखरेख में मनु भाकर ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय निशानेबाज बनीं। अनुशासन, तकनीकी दक्षता और खेल के प्रति समर्पण के लिए प्रसिद्ध जसपाल राणा ने कई विश्वस्तरीय शूटर तैयार किए।
भारतीय निशानेबाजी में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए उन्हें 1994 में अर्जुन पुरस्कार, 1997 में पद्मश्री और कोचिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने ऐसे समय में भारत में निशानेबाजी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई, जब यह खेल सीमित दायरे तक ही सिमटा हुआ था।
भारतीय निशानेबाजी में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। उनका निधन खेल जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। जसपाल राणा के जाने के बाद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीय शूटिंग में एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है।



