ज्ञानवापी विवाद में नया मोड़
वाराणसी अदालत ने 'बचे हुए हिस्सों' के एएसआई (ASI) सर्वेक्षण की याचिका स्वीकारी, 2 जून को होगी अहम सुनवाई

उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित ऐतिहासिक और अत्यधिक संवेदनशील ज्ञानवापी परिसर का मामला एक बार फिर न्यायिक और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। वाराणसी की जिला अदालत ने मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम में ज्ञानवापी परिसर के उन ‘बचे हुए हिस्सों’ के एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण – ASI) सर्वेक्षण की मांग वाली एक नई याचिका को विचारार्थ स्वीकार कर लिया है, जिनका अब तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं हो सका है। अदालत ने इस मामले में अगली और अहम सुनवाई के लिए 2 जून की तारीख मुकर्रर की है। यह निर्णय न केवल इस लंबे कानूनी संघर्ष की दिशा तय करेगा, बल्कि इसका राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरा प्रभाव पड़ना तय है।
याचिका की पृष्ठभूमि और ‘बचे हुए हिस्से’ का अर्थ:
इस नए कानूनी दांव-पेंच को समझने के लिए पिछले सर्वेक्षणों की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। इससे पहले, अदालत के आदेश पर एएसआई (ASI) ने ज्ञानवापी के एक बड़े हिस्से का वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GPR Survey) किया था और अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंप दी थी। हिंदू पक्ष का दावा था कि उस रिपोर्ट में मंदिर के स्पष्ट अवशेष और पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।
हालांकि, उस पिछले सर्वेक्षण में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के आदेशानुसार ‘वजूखाना’ (Wazukhana) क्षेत्र को सील रखा गया था, जहां हिंदू पक्ष ने ‘शिवलिंग’ मिलने का दावा किया था, जबकि मुस्लिम पक्ष ने उसे ‘फव्वारा’ (Fountain) बताया था। इसके अतिरिक्त, परिसर के कुछ तहखाने और बंद हिस्से भी सर्वेक्षण से अछूते रह गए थे। अब हिंदू पक्ष के वकीलों ने अदालत के समक्ष तर्क दिया है कि संपूर्ण सत्य को सामने लाने और न्याय के हित में यह नितांत आवश्यक है कि परिसर का कोई भी कोना वैज्ञानिक जांच से वंचित न रहे।
न्यायिक प्रक्रिया और दोनों पक्षों के तर्क:
जिला न्यायाधीश की अदालत में याचिकाकर्ता (हिंदू पक्ष) ने दलील दी कि बिना संपूर्ण परिसर के सर्वेक्षण के मामले का अंतिम और तार्किक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने आधुनिक रडार तकनीक (Ground Penetrating Radar) का उपयोग कर बिना किसी ढांचे को नुकसान पहुंचाए जांच की मांग की है।
दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष (अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी) ने इस नई याचिका का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि बार-बार सर्वेक्षण की मांग करना प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 (Places of Worship Act, 1991) का सीधा उल्लंघन है, जो 15 अगस्त 1947 के समय मौजूद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है। मुस्लिम पक्ष का यह भी मानना है कि इस प्रकार की याचिकाएं केवल विवाद को जीवित रखने और समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। अदालत ने मुस्लिम पक्ष को 2 जून तक अपनी आपत्तियां लिखित रूप में दर्ज कराने का निर्देश दिया है।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव:
काशी (वाराणसी) का यह मामला अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद के बाद देश का सबसे बड़ा धार्मिक-कानूनी मुद्दा बन चुका है। 2 जून की सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी होंगी। यदि अदालत बचे हुए हिस्सों (विशेषकर संवेदनशील वजूखाने के आस-पास) के सर्वेक्षण की अनुमति दे देती है, तो यह मुस्लिम पक्ष के लिए एक बड़ा कानूनी झटका होगा और हिंदू पक्ष के दावों को एक नई कानूनी ऊर्जा मिलेगी।
ज्ञानवापी परिसर का सत्य क्या है, यह अंततः पुरातात्विक साक्ष्यों और न्यायालय की कसौटी पर ही तय होगा। वाराणसी की अदालत का यह हालिया कदम इस दिशा में न्यायपालिका की उस मंशा को दर्शाता है जिसमें वह किसी भी तकनीकी या ऐतिहासिक साक्ष्य को अनदेखा नहीं करना चाहती। 2 जून की सुनवाई इस ऐतिहासिक विवाद के भविष्य का खाका खींचने में एक निर्णायक मील का पत्थर साबित होगी।



