दिल कहे ‘हां’, दिमाग कहे ‘ना’-किसकी माने?

स्नेहा सिंह: दिल और दिमाग के बीच की दुविधा में दिल को धोखा नहीं देना चाहिए, क्योंकि दिमाग विचारों के भंवर से अस्थिरता पैदा करता है, जबकि दिल में भावनाओं का प्रवाह स्थिरता देता है।
जिंदगी में कई बार ऐसा होता है, जब हम उलझन में पड़ जाते हैं कि दिल की सुनें या दिमाग की। मन और मस्तिष्क के अपने-अपने तर्क होते हैं, लेकिन दोनों अक्सर एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत होते हैं। ऐसी स्थिति में लोग कहते हैं कि मन की सुनो, क्योंकि मन कभी झूठ नहीं बोलता। तब हमारे मन में सवाल उठता है कि क्या सचमुच मन कुछ बोल सकता है?
इसका उत्तर ‘हां’ में है। फिर भी एक बात स्पष्ट है कि हम दिमाग से सोची हुई बात आसानी से व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन मन की बात उतनी सहजता से व्यक्त नहीं कर पाते। जैसे प्यार का संबंध दिमाग से नहीं, दिल से होता है। लेकिन क्या अपने प्यार का इजहार करना आसान होता है?
कहा जाता है कि चेहरा मन का आईना होता है। मन में जो चल रहा होता है, वह तुरंत चेहरे पर झलक जाता है, चाहे वह खुशी हो या दुख-दर्द। हालांकि सामने वाला व्यक्ति आपके चेहरे को कितनी अच्छी तरह पढ़ पाता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
साहित्यकारों के अनुसार मन की एक विशेष भाषा होती है। फिर भी मन की बात व्यक्त करने के लिए किसी निश्चित भाषा या शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। साहित्य का सृजन दिल से होता है और दिल से निकली कविताएं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इसलिए यह बात पूरी तरह सही है कि दिल की भी अपनी एक भाषा होती है।
हमारी आंखें भी मन की भावनाओं को व्यक्त करने वाली भाषा हैं। प्रेमी युगल को अपना प्यार जताने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, आंखों ही आंखों में उनकी बात हो जाती है और वे एक-दूसरे को समझ भी लेते हैं। इस तरह आंखों को भी दिल की भाषा कहा जा सकता है।
आंसू दिल की तीसरी भाषा हैं। जब हम बहुत दुखी होते हैं या अत्यधिक खुश होते हैं, तब भी आंखों से आंसू बह निकलते हैं। हम चाहें उन्हें रोकने की कोशिश करें, फिर भी आंखें नम हो ही जाती हैं और वे मन की बात कह देती हैं।
झमाझम बारिश में प्रेमी युगल इतने भावुक हो जाते हैं कि शब्द खत्म हो जाते हैं, होंठ थम जाते हैं। फिर भी यह खामोशी ही उनके दिल की भाषा बन जाती है। बिना एक शब्द बोले भी मन की भावनाएं व्यक्त करने की शक्ति खामोशी में होती है।
जब व्यक्ति निराश या हताश होता है, मन में उथल-पुथल चल रही होती है, लेकिन मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता, तब भी उसकी उदासी सब कुछ कह देती है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दिल की वास्तव में एक भाषा होती है। इंसान हमेशा दो तरह से सोचता है, मन से और दिमाग से। मन जो कहता है, वह अक्सर दिमाग के विपरीत होता है। इसका कारण यह है कि मन संवेदनाओं से भरा होता है, इसलिए दिल की बात भावनाओं से परिपूर्ण होती है। जहां संवेदना होती है, वहां सच्चाई होती है।
दूसरी ओर दिमाग विभिन्न प्रकार के रसायनों से प्रभावित होता है, इसलिए वह सोच-समझकर निर्णय लेता है। और जहां केवल विचार होता है, वहां दिखावा, चालाकी, झूठ, धोखा या बेईमानी की संभावना भी रहती है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि दिमाग केवल नकारात्मक ही सोचता है। सृजन, व्यवसाय, योजना, शोध या गणना जैसे कार्यों में दिमाग की ही आवश्यकता होती है।
हां, कोई भी काम करने से पहले मन से जरूर पूछ लें कि आपसे कोई गलत काम तो नहीं हो रहा। आपका दिल आपको निश्चित रूप से सही उत्तर दे देगा।



