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सुप्रीम कोर्ट से बंगाल के लाखों मतदाताओं को बड़ा झटका

SIR प्रक्रिया में हटाए गए नामों को मतदान का अधिकार नहीं

आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने उन लाखों मतदाताओं को कोई भी अंतरिम राहत या छूट देने से साफ इनकार कर दिया है, जिनके नाम हाल ही में मतदाता सूची (Voter Roll) को अद्यतन करने की प्रक्रिया के दौरान हटा दिए गए थे। यह फैसला राज्य के राजनीतिक दलों और विशेषकर उन लाखों आम नागरिकों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, जो इस महीने होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में अपने लोकतांत्रिक अधिकार, यानी मताधिकार का प्रयोग करने की उम्मीद लगाए बैठे थे।

क्या है पूरा मामला और SIR प्रक्रिया?

इस पूरे विवाद की जड़ ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया है। यह मुख्य रूप से मतदाता सूची को साफ करने (clean-up process), उसे त्रुटिहीन बनाने और फर्जी या अपात्र मतदाताओं को हटाने के लिए चलाया गया एक सघन अभियान था। इस प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे।

जिन नागरिकों के नाम इस अभियान के दौरान काटे गए, उनमें से लाखों लोगों ने इस फैसले के खिलाफ संबंधित अपीलीय न्यायाधिकरणों (appellate tribunals) में अपनी अपील दायर की। मुख्य विवाद इस बात पर केंद्रित था कि जब तक इन अपीलों पर न्यायाधिकरण का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक क्या इन नागरिकों को आगामी चुनाव में वोट डालने का ‘अंतरिम अधिकार’ (interim voting rights) मिलना चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए यह तय कर दिया है कि लंबित अपीलों वाले इन लोगों को चुनाव में मतदान करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

अदालत में दलीलें और तृणमूल कांग्रेस का पक्ष:
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में काफी गहन बहस देखने को मिली। राज्य की सत्ताधारी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने अदालत के सामने इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाने के लिए कुछ चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने पीठ को अवगत कराया कि मतदाता सूची से नाम काटे जाने के विरोध में कम से कम 1.6 मिलियन (यानी 16 लाख) अपीलें दायर की गई हैं, जो अभी भी विभिन्न न्यायाधिकरणों में फैसले के लिए लंबित हैं।

कल्याण बनर्जी ने अदालत से पुरजोर आग्रह किया कि चूंकि इतनी बड़ी संख्या में लोगों की अपीलें अभी विचाराधीन हैं और उन पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, इसलिए इन 16 लाख नागरिकों को इस महीने के अंत में होने वाले दो-चरणों (two-phase) के विधानसभा चुनाव में मतदान करने की विशेष अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया।

आगामी चुनावों पर प्रभाव और निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह इनकार पश्चिम बंगाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा और सीधा असर डाल सकता है। 16 लाख मतदाताओं का अचानक चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो जाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए भारी चिंता का विषय है, क्योंकि इतने बड़े आंकड़े से कई विधानसभा सीटों के हार-जीत के समीकरण पूरी तरह से बदल सकते हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की दिशा में एक सख्त कदम है। लेकिन साथ ही, यह उन लाखों लोगों के लिए अत्यंत निराशाजनक है जो इस बार वोट नहीं डाल पाएंगे। इस महीने होने वाले दो-चरणीय चुनावों के लिए इन 16 लाख मतदाताओं के पास अब कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा है, जिससे राज्य का चुनावी माहौल और भी अधिक तनावपूर्ण और दिलचस्प हो गया है।

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