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नए आपराधिक कानूनों पर फिलहाल रोक नहीं: जनहित याचिकाओं पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

पल्लवी श्रीवास्तव/नई दिल्ली: देश की औपनिवेशिक काल की दंड प्रणाली को समाप्त कर हाल ही में लागू किए गए तीन नए आपराधिक कानूनों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को बड़ी राहत मिली है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन सभी जनहित याचिकाओं (PILs) पर तत्काल सुनवाई करने से फिलहाल इनकार कर दिया है, जिनमें नए कानूनों—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)—की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं की क्या थीं चिंताएं?

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाओं में वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया था कि इन नए कानूनों में पुलिस को ‘असीमित शक्तियां’ (Unbridled Powers) दे दी गई हैं। विशेष रूप से पुलिस रिमांड की अवधि को 15 दिन से बढ़ाकर अधिक करने, आतंकवाद की नई परिभाषा, और हथकड़ी लगाने के प्रावधानों को मानवाधिकारों के खिलाफ और ‘कठोर’ (Draconian) बताया गया था। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि जब तक इन कानूनों की विस्तृत न्यायिक समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक इनके क्रियान्वयन पर रोक (Stay) लगाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और तर्क

मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने इन जनहित याचिकाओं को ‘अमूर्त’ (Abstract) करार देते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल हवा-हवाई आशंकाओं के आधार पर संसद द्वारा पारित किसी कानून पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, “कानूनों को अभी लागू हुए कुछ ही दिन हुए हैं। जब इन कानूनों के तहत किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कोई वास्तविक मामला (Actual Case) दर्ज होगा और उसे लगेगा कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, तब हम उस विशिष्ट मामले की सुनवाई करेंगे। हम पूरे कानून को एक जनहित याचिका के आधार पर निरस्त नहीं कर सकते।”

परिवर्तन का दौर जारी

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि नए आपराधिक कानून देश भर में बिना किसी कानूनी बाधा के लागू रहेंगे। गृह मंत्रालय पहले ही देश के सभी थानों, पुलिसकर्मियों और अदालतों को इन कानूनों (BNS, BNSS, BSA) के तहत काम करने का प्रशिक्षण दे चुका है। सरकार का दावा है कि ये नए कानून दंड के बजाय ‘न्याय’ (Justice) पर केंद्रित हैं और इनमें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और त्वरित सुनवाई को प्राथमिकता दी गई है.

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