महान शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन : कई वर्षों से डिमेंशिया से जूझ रहे थे, साहित्यिक जगत में शोक की लहर

भोपाल/लखनऊ : भारतीय अदब के आसमान का एक और चमकदार सितारा हमेशा के लिए ढल गया। अपनी सहज, सुरीली और सीधे दिल में उतर जाने वाली शायरी से दुनिया भर के करोड़ों दिलों पर राज करने वाले दिग्गज शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। उनके परिवार के मुताबिक, उन्होंने गुरुवार दोपहर भोपाल में अंतिम सांस ली।
उनके बेटे सैयद बद्र ने अत्यंत भावुक शब्दों में इस अपूरणीय क्षति की पुष्टि करते हुए कहा, बशीर बद्र साहब आज दोपहर में गुजर गए। उनके जाने का दुख शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उन्होंने मेरे जीवन पर बहुत गहरा असर छोड़ा है। मैं सब से गुजारिश करता हूं कि उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करें।
‘हमारी उर्दू ज़ुबान थोड़ी और गरीब हो गई’
बद्र साहब के रुखसत होने से साहित्य, सिनेमा और कला जगत स्तब्ध है। मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा, आज हमारी ज़बान उर्दू थोड़ी और ग़रीब हो गई है। बशीर बद्र एक बेहद सुरीले शायर हमेशा के लिए हमारी महफ़िल से रुख़सत हो गए हैं। यह शायर और इनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
वहीं, सुप्रसिद्ध कवि और राजनेता डॉ. कुमार विश्वास ने बद्र साहब के ही एक कालजयी शेर को साझा करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा..मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी…। रेशमी लहजे और सहज कहन के शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र जी को ईश्वर के लोक की यात्रा मोक्षदा हो। ओम शांति।”
उर्दू अदब को सहेजने वाली वैश्विक संस्था रेख़्ता फाउंडेशन ने इसे आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के एक गौरवशाली अध्याय का अंत बताया। रेख़्ता ने अपनी श्रद्धांजलि में लिखा, “वे जन-जन के कवि थे; उन्होंने उर्दू शायरी को जटिल रूपकों के दायरे से बाहर निकालकर आम लोगों के धड़कते दिलों तक पहुँचाया। प्रेम से लेकर गहन दर्शन तक-उन्होंने हर विषय पर बेजोड़ नज़ाकत के साथ लिखा।
शिमला समझौते से लेकर सोशल मीडिया तक: अमर हैं बद्र साहब के शेर
डॉ. बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने शायरी को क्लिष्ट और भारी-भरकम शब्दों के जाल से मुक्त कर आम बोलचाल की भाषा (हिंदुस्तानी ज़ुबान) में ढाला। उनके शेर आज भी राजनीति के गलियारों, कूटनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर समान रूप से प्रासंगिक हैं।
यह ऐतिहासिक रूप से याद किया जाता है कि 1972 के भारत-पाकिस्तान शिमला समझौते के दौरान भी उनका एक बेहद मशहूर शेर गूंजा था, जो दोनों देशों के रिश्तों की कड़वाहट और भविष्य की उम्मीदों को बयां करता है….
“दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।
आज सोशल मीडिया पर उनके प्रशंसकों द्वारा उनके ये अमर शेर सबसे ज्यादा साझा कर श्रद्धांजलि दी जा रही है।कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”
साहित्य और पत्रकारिता जगत के विशेषज्ञों ने उन्हें ‘मुहब्बत और इंसानियत का शायर’ करार दिया है। डॉ. बशीर बद्र भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन अपनी ग़ज़लों, नज़्मों और सादगी भरे रेशमी लहजे के जरिए वे आने वाली कई पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।



