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दिल्ली में फिर सीवर बना मौत का कुआं

न्यू अशोक नगर में सफाई मजदूर की दर्दनाक मौत, NHRC ने लिया सख्त स्वतः संज्ञान, पुलिस से मांगी रिपोर्ट

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हाथ से मैला ढोने (Manual Scavenging) और बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर सफाई करने पर सख्त कानूनी प्रतिबंध है, इसके बावजूद मजदूरों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्वी दिल्ली के न्यू अशोक नगर (New Ashok Nagar) इलाके में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से 55 वर्षीय एक मजदूर की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि दूसरे की हालत गंभीर बनी हुई है। इस अमानवीय घटना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लिया है और दिल्ली पुलिस आयुक्त तथा नगर निगम आयुक्त को नोटिस जारी कर 2 सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच देश की राजधानी दिल्ली की जमीन के नीचे एक ऐसी खौफनाक सच्चाई बह रही है, जो हर साल कई गरीब मजदूरों की जान ले लेती है। 24 मई 2026 की दोपहर पूर्वी दिल्ली के न्यू अशोक नगर इलाके (ए-ब्लॉक, गली नंबर 41) में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई का काम एक बार फिर ‘मौत का कुआं’ साबित हुआ। इस घटना ने प्रशासन की लापरवाही और ठेकेदारों की संवेदनहीनता को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है।

क्या हुआ था उस मनहूस दोपहर को?

दिल्ली पुलिस की प्रारंभिक जांच के अनुसार, न्यू अशोक नगर के एक मकान मालिक ने अपने घर का सेप्टिक टैंक (Sewage Tank) साफ करवाने के लिए अनिल नामक एक स्थानीय ठेकेदार को काम सौंपा था। ठेकेदार ने इस खतरनाक काम के लिए नोएडा सेक्टर-16 के रहने वाले दो मजदूरों—विनोद (55 वर्ष) और धर्मेंद्र (34 वर्ष)—को दिहाड़ी पर बुलाया।

दोपहर के समय जब ये दोनों मजदूर लगभग आठ फुट गहरे सेप्टिक टैंक में उतरे, तो ठेकेदार ने उन्हें ऑक्सीजन मास्क, सेफ्टी बेल्ट या किसी भी प्रकार का ‘सुरक्षा उपकरण’ (Protective Gear) मुहैया नहीं कराया था। टैंक के अंदर वर्षों से जमा मल-मूत्र और कचरे के कारण भयंकर जहरीली गैसें (Toxic Gases) बन चुकी थीं। टैंक में उतरते ही कुछ ही मिनटों के भीतर दोनों मजदूर गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गए और अंदर गिर पड़े।

स्थानीय लोगों और ठेकेदार ने रस्सियों और हुक की मदद से उन्हें बाहर निकाला और पास के लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल (LBS Hospital) ले गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने विनोद को मृत घोषित कर दिया, जबकि धर्मेंद्र की हालत अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है। बताया जा रहा है कि मृतक विनोद अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का सख्त एक्शन

मीडिया में इस हृदय विदारक खबर के आने के बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस घटना का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया है। आयोग ने कहा है कि यदि रिपोर्ट सही है, तो यह मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन (Violation of Human Rights) का एक बहुत गंभीर मामला है।

NHRC ने 27 मई 2026 को दिल्ली नगर निगम (MCD) के आयुक्त और दिल्ली पुलिस आयुक्त को कड़े नोटिस जारी किए हैं। आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि 2 सप्ताह के भीतर मामले की विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश की जाए। इस रिपोर्ट में पुलिस जांच की वर्तमान स्थिति और मृतक के परिवार (Next of Kin) तथा घायल मजदूर को दिए गए मुआवजे (Compensation) का पूरा ब्योरा शामिल होना चाहिए।

कानून का खुला उल्लंघन

भारत में वर्ष 2013 से ही ‘हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम’ (Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act) पूरी तरह लागू है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने भी स्पष्ट आदेश दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति को बिना संपूर्ण जीवन रक्षक उपकरणों के सीवर में नहीं उतारा जा सकता। इसके बावजूद, चंद रुपयों के लालच में मकान मालिक और ठेकेदार गरीब मजदूरों की जान दांव पर लगा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में लापरवाही से मौत का मामला (FIR) दर्ज कर लिया है और ठेकेदार तथा मकान मालिक से पूछताछ की जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कड़े कानूनों और अदालती आदेशों के बावजूद देश की राजधानी में यह अमानवीय प्रथा (Manual Scavenging) कब और कैसे पूरी तरह खत्म होगी?

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