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डिजिटल ठगी के सबसे बड़े सिंडिकेट का पर्दाफाश

'वर्क फ्रॉम होम' के नाम पर 100 करोड़ की ठगी, यूपी एसटीएफ और नोएडा पुलिस की बड़ी कार्रवाई

तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण के इस युग में जहां सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं साइबर अपराध एक अत्यंत संगठित और खौफनाक उद्योग बन चुका है। आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई लूटने वाले ऐसे ही एक विशाल और अंतरराष्ट्रीय साइबर ठग गिरोह का उत्तर प्रदेश पुलिस ने पर्दाफाश किया है। यूपी स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और नोएडा पुलिस के एक संयुक्त और अत्यंत गुप्त ऑपरेशन में, एक ऐसे साइबर सिंडिकेट को ध्वस्त किया गया है जिसने देश भर के हजारों मासूम लोगों से 100 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की थी। पुलिस ने इस गिरोह के 15 शातिर हैकर्स और मास्टमाइंड्स को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई साइबर आतंकवाद और सफेदपोश (White-collar) अपराध के खिलाफ भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों की एक शानदार और ऐतिहासिक जीत है।

कैसे बिछाया जाता था ठगी का जाल? (मॉडस ऑपरेंडी):
इस गिरोह की ठगी का तरीका (Modus Operandi) मनोवैज्ञानिक और तकनीकी, दोनों ही स्तरों पर बेहद शातिर था। ये ठग मुख्य रूप से उन युवाओं, गृहिणियों और बेरोजगारों को निशाना बनाते थे जो घर बैठे अतिरिक्त आय (Part-time income) की तलाश में रहते थे। व्हाट्सएप और टेलीग्राम के माध्यम से थोक में ‘वर्क फ्रॉम होम’ (Work From Home) या ‘यूट्यूब वीडियो लाइक करके पैसे कमाएं’ (Like YouTube Videos and Earn) के लुभावने संदेश भेजे जाते थे।

जब कोई पीड़ित इनके जाल में फंसता, तो शुरुआत में उसे विश्वास दिलाने के लिए कुछ यूट्यूब वीडियो लाइक करने के एवज में उसके बैंक खाते में 150 से 500 रुपये की छोटी रकम वास्तविक रूप से भेजी जाती थी। जब पीड़ित का विश्वास पूरी तरह जम जाता, तब असली खेल शुरू होता था। उसे ‘वीआईपी टेलीग्राम ग्रुप्स’ (VIP Telegram Groups) में जोड़ा जाता और ‘प्रीमियम टास्क’ (Premium Tasks) के नाम पर क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) या प्री-पेड मर्चेंट टास्क में निवेश करने को कहा जाता। उच्च रिटर्न (मुनाफे) के लालच में पीड़ित लाखों रुपये इनके द्वारा बताए गए फर्जी बैंक खातों में ट्रांसफर कर देते थे। पैसा मिलते ही ठग पीड़ितों को ब्लॉक कर देते और पूरा संपर्क काट देते थे।

100 करोड़ का घोटाला और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन:
नोएडा पुलिस और एसटीएफ की जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इस गिरोह के तार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार, विशेषकर दुबई, चीन और कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों से जुड़े हुए थे। भारत में लूटी गई यह 100 करोड़ रुपये से अधिक की रकम को फर्जी शेल कंपनियों (Shell Companies) और खच्चर खातों (Mule Accounts) के माध्यम से घुमाया जाता था, और अंततः इसे क्रिप्टोकरेंसी (जैसे USDT) में बदलकर देश से बाहर भेज दिया जाता था। इस रैकेट का पैमाना इतना बड़ा था कि देश के लगभग हर राज्य में इनके खिलाफ शिकायतें दर्ज थीं।

एसटीएफ और नोएडा पुलिस का सफल ‘ऑपरेशन’:
यह गिरफ्तारी रातों-रात नहीं हुई। महीनों से साइबर सेल, एसटीएफ और नोएडा पुलिस डार्क वेब, आईपी (IP) एड्रेस, और संदिग्ध बैंक लेन-देन (Transactions) की डिजिटल मैपिंग कर रही थी। पुख्ता खुफिया जानकारी मिलने के बाद, नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई। गिरफ्तार किए गए 15 हैकर्स के पास से दर्जनों लैपटॉप, सैकड़ों फर्जी सिम कार्ड, डेबिट कार्ड, सर्वर का डेटा और नकद राशि बरामद की गई है। पुलिस अब इन आरोपियों को रिमांड पर लेकर इनके अंतरराष्ट्रीय आकाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

नोएडा में हुआ यह भंडाफोड़ यह सिद्ध करता है कि साइबर अपराधी चाहे कितने भी शातिर क्यों न हों, वे कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सकते। हालांकि, पुलिस की इस सफलता के साथ-साथ यह आम जनता के लिए भी एक अत्यंत गंभीर चेतावनी है। इंटरनेट पर कोई भी अनजान व्यक्ति या कंपनी केवल वीडियो लाइक करने या घर बैठे बिना किसी वास्तविक श्रम के हजारों रुपये नहीं देती। डिजिटल सुरक्षा का सबसे बड़ा हथियार नागरिक की अपनी जागरूकता और लालच पर नियंत्रण है।

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