न्यायपालिका को सुदृढ़ करने की दिशा में बड़ा कदम
अध्यादेश के जरिए सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़कर 37 हुई

“न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है” (Justice delayed is justice denied) – यह विधिक सूक्ति भारतीय न्याय प्रणाली की वर्तमान स्थिति पर सटीक बैठती है। देश की अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमों का बोझ न केवल आम नागरिकों को हताश करता है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी ज्वलंत समस्या के समाधान और सर्वोच्च न्यायालय की कार्यक्षमता को बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने एक विशेष अध्यादेश (Ordinance) प्रख्यापित करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को वर्तमान से बढ़ाकर 37 कर दिया है। यह कदम त्वरित न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
अध्यादेश की आवश्यकता और वर्तमान स्थिति:
संसद सत्र के अभाव में जब किसी अति-महत्वपूर्ण विषय पर तत्काल कानून की आवश्यकता होती है, तो संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए इस मार्ग का चयन यह दर्शाता है कि सरकार शीर्ष अदालत में मुकदमों के बढ़ते बैकलॉग (Backlog) को लेकर कितनी गंभीर है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय दुनिया के सबसे व्यस्त न्यायालयों में से एक है। हर दिन सैकड़ों नई याचिकाएं, अपीलें और जनहित याचिकाएं (PILs) दाखिल होती हैं। न्यायाधीशों की सीमित संख्या के कारण संवैधानिक पीठ (Constitutional Benches) के गठन में देरी होती थी और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सुनवाई टलती रहती थी।
ऐतिहासिक संदर्भ: 8 से 37 तक का सफर:
जब 1950 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई थी, तब मूल संविधान में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 8 न्यायाधीशों का प्रावधान था। जैसे-जैसे देश की जनसंख्या बढ़ी और कानूनी जटिलताएं उत्पन्न हुईं, संसद ने समय-समय पर ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956’ में संशोधन कर इस संख्या को बढ़ाया। इसे 1956 में 11, 1960 में 14, 1978 में 18, 1986 में 26, 2009 में 31 और फिर 2019 में 34 किया गया था। अब इस नवीनतम अध्यादेश के माध्यम से यह स्वीकृत संख्या 37 के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है।
वृद्धि के सकारात्मक प्रभाव:
न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 37 होने से न्याय प्रणाली में कई सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेंगे:
मामलों का त्वरित निपटारा: अधिक न्यायाधीशों का अर्थ है अधिक बेंचों का गठन। इससे नियमित अपीलों, जमानत याचिकाओं और दीवानी मुकदमों की सुनवाई में तेजी आएगी।
संवैधानिक पीठों की नियमितता: अब पांच या सात न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठों का गठन आसान होगा, जिससे देश के अहम कानूनी और संवैधानिक सवालों के जवाब समय पर मिल सकेंगे।
न्यायाधीशों पर दबाव कम होना: कार्यभार के समान वितरण से न्यायाधीशों को प्रत्येक मामले के अध्ययन और निर्णय लिखने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे न्याय की गुणवत्ता (Quality of Justice) में और सुधार होगा।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को 37 करना केंद्र सरकार का एक अत्यंत स्वागत योग्य निर्णय है। हालांकि, केवल शीर्ष अदालत में क्षमता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। लंबित मामलों की वास्तविक जड़ें निचली अदालतों (Subordinate Courts) और उच्च न्यायालयों में भी हैं। न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण, अदालती प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और निचली अदालतों में जजों के खाली पदों को युद्ध स्तर पर भरना भी उतना ही आवश्यक है। समग्र सुधारों से ही देश का आम नागरिक समय पर न्याय प्राप्त कर सकेगा।



