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भारत-नॉर्डिक संबंधों का नया क्षितिज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा और तीसरे शिखर सम्मेलन के रणनीतिक मायने

वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक प्राथमिकताओं के बदलते दौर में भारत अपनी विदेश नीति को निरंतर नई दिशा दे रहा है। इसी कूटनीतिक विस्तार के अंतर्गत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वीडन के अपने बेहद सफल और ऐतिहासिक दौरे को संपन्न करने के पश्चात अपनी पांच देशों की यात्रा के तीसरे चरण में नॉर्वे पहुंच चुके हैं। नॉर्वे की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य ओस्लो में आयोजित हो रहे ‘तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन’ (India-Nordic Summit) में भाग लेना है। यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा असुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के पुनर्गठन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। इस परिदृश्य में, भारत और नॉर्डिक देशों (नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड) का एक मंच पर आना वैश्विक राजनीति में एक नए और मजबूत गठजोड़ का उद्घोष है।

स्वीडन की सफलता और नॉर्वे का सर्वोच्च नागरिक सम्मान:
नॉर्वे की भूमि पर कदम रखने से पूर्व, प्रधानमंत्री मोदी की स्वीडन यात्रा कूटनीतिक रूप से अत्यंत फलदायी रही। स्वीडन सरकार ने दोनों देशों के प्रगाढ़ होते संबंधों को मान्यता देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार’ से सम्मानित किया है। यह सम्मान केवल प्रधानमंत्री के प्रति नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर 140 करोड़ भारतीयों की बढ़ती साख और भारत की आर्थिक क्षमता का सम्मान है। स्वीडन से मिले इस सकारात्मक प्रोत्साहन के बाद जब प्रधानमंत्री नॉर्वे पहुंचे, तो ओस्लो में उनका अभूतपूर्व और गर्मजोशी से स्वागत किया गया, जो इस बात का संकेत है कि नॉर्डिक देश भारत को इक्कीसवीं सदी की एक अनिवार्य महाशक्ति के रूप में देख रहे हैं।

तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन: मुख्य एजेंडा:
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन है। नॉर्डिक क्षेत्र के पांच देश—नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड—भले ही जनसंख्या में छोटे हों, परंतु नवाचार (Innovation), हरित प्रौद्योगिकी (Green Technology), स्वच्छ ऊर्जा और सतत विकास के मामलों में ये विश्व के सबसे अग्रणी राष्ट्र हैं। भारत के दृष्टिकोण से यह सम्मेलन तीन मुख्य क्षेत्रों पर केंद्रित है:

हरित संक्रमण और स्वच्छ ऊर्जा (Green Transition & Clean Energy): भारत ने वैश्विक मंचों पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाने के कड़े संकल्प लिए हैं। नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देश ‘हरित हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen), अपतटीय पवन ऊर्जा (Offshore Wind Energy) और महासागरीय ऊर्जा के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं। इस सम्मेलन में भारत इन उन्नत प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण और संयुक्त अनुसंधान के लिए कई द्विपक्षीय समझौतों को अंतिम रूप दे रहा है।

नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) और समुद्री सहयोग: भारत की एक विशाल तटरेखा है और नॉर्वे गहरे समुद्र की प्रौद्योगिकियों, सतत मत्स्य पालन (Sustainable Fisheries) और समुद्री संसाधन प्रबंधन में वैश्विक अगुआ है। दोनों देशों के बीच नीली अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर रणनीतिक सहयोग पर गहन चर्चा हो रही है, जिससे भारत के तटीय विकास को नई गति मिलेगी।

डिजिटल अवसंरचना और नवाचार: भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र (जैसे यूपीआई और डिजिटल इंडिया) और नॉर्डिक देशों की उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता के बीच तालमेल स्थापित करना इस वार्ता का एक और प्रमुख बिंदु है।

भारत और नॉर्वे के द्विपक्षीय संबंध: निवेश और संप्रभु कोष:
शिखर सम्मेलन के इतर, प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आर्थिक मोर्चे पर, नॉर्वे का ‘गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल’ (जो दुनिया का सबसे बड़ा संप्रभु धन कोष या Sovereign Wealth Fund है) भारत के बुनियादी ढांचे, नवीकरणीय ऊर्जा और शेयर बाजार में अपने निवेश का निरंतर विस्तार कर रहा है। प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान भारतीय नियमों को और अधिक सुगम बनाने और नॉर्वेजियन फंड को भारत के राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष (NIIF) में बड़े पैमाने पर निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, आर्कटिक क्षेत्र (Arctic Region) में वैज्ञानिक अनुसंधान और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अध्ययन के लिए दोनों देशों के वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग को और अधिक सुदृढ़ किया जा रहा है।

भू-राजनीतिक निहितार्थ और वैश्विक संदेश:
वर्तमान में पश्चिम एशिया के तनाव और वैश्विक महाशक्तियों के बीच चल रही खींचतान के मध्य, भारत द्वारा उत्तरी यूरोप के इन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। भारत यह संदेश दे रहा है कि वह केवल पारंपरिक शक्तियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह उन देशों के साथ भी मजबूत कूटनीतिक पुल बना रहा है जो तकनीकी रूप से समृद्ध और भू-राजनीतिक रूप से तटस्थ व शांतिप्रिय हैं। नॉर्डिक देशों के लिए भी, भारत का विशाल बाजार और कुशल मानव संसाधन उनकी अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करने का एक सुनहरा अवसर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह नॉर्वे यात्रा और तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी भारत के कूटनीतिक इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय लिख रही है। स्वीडन के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत होकर नॉर्वे पहुंचे प्रधानमंत्री ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत की ‘वैश्विक मित्र’ (Global Friend) की छवि अब धरातल पर परिणाम दे रही है। हरित प्रौद्योगिकी, सतत विकास और नीली अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में होने वाले ये समझौते आने वाले दशकों में भारत को आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल आर्थिक महाशक्ति बनाने में मील का पत्थर साबित होंगे। ओस्लो से निकलने वाले कूटनीतिक परिणाम न केवल भारत-नॉर्वे संबंधों को, बल्कि समूचे नॉर्डिक क्षेत्र के साथ भारत की साझेदारी को एक नई और अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान करेंगे।

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