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भारतीय निर्यात परिदृश्य में बड़ा बदलाव

पश्चिम एशिया के तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात को पछाड़कर सिंगापुर बना भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है। पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में चल रहे निरंतर तनाव और लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में व्यापारिक मार्गों पर उत्पन्न हुए संकट ने भारत के विदेश व्यापार के स्वरूप में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव ला दिया है। ताज़ा आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशियाई देश सिंगापुर ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को पछाड़कर भारत के दूसरे सबसे बड़े निर्यात गंतव्य (Export Destination) का महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया है। (अमेरिका अभी भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बना हुआ है)। यह बदलाव भारतीय निर्यातकों के बदलते मार्ग और ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति की बढ़ती प्रासंगिकता को दर्शाता है।

यूएई के पिछड़ने का कारण: भू-राजनीतिक अस्थिरता:
पारंपरिक रूप से, संयुक्त अरब अमीरात भारतीय निर्यात के लिए, विशेषकर आभूषण, परिधान, और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए, सबसे सुरक्षित और बड़े बाजारों में से एक रहा है। इसके साथ ही यूएई भारत के लिए अफ्रीका और यूरोप के बाजारों का एक पारगमन केंद्र (Transit Hub) भी रहा है। किंतु, हाल के महीनों में इजराइल-हमास संघर्ष, ईरान-इजराइल तनाव और हौथी विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर लगातार हो रहे हमलों के कारण स्वेज नहर के रास्ते होने वाला व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस अस्थिरता के कारण माल ढुलाई (Freight) की लागत कई गुना बढ़ गई है और बीमा प्रीमियम भी आसमान छू रहे हैं। यही कारण है कि भारतीय निर्यातकों ने जोखिम कम करने के लिए पश्चिम एशिया के बजाय पूर्व के सुरक्षित बाजारों का रुख किया है।

सिंगापुर का उदय: आसियान का प्रवेश द्वार:
इन परिस्थितियों में सिंगापुर भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे सुरक्षित और आकर्षक विकल्प बनकर उभरा है। सिंगापुर न केवल एक अत्यंत सुदृढ़ और मुक्त अर्थव्यवस्था है, बल्कि यह संपूर्ण आसियान (ASEAN) क्षेत्र और सुदूर पूर्व के बाजारों का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार भी है। भारत से सिंगापुर को होने वाले निर्यात में मुख्य रूप से परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद (Refined Petroleum Products), इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी, और बहुमूल्य रत्न व आभूषण शामिल हैं।

सिंगापुर के साथ भारत का व्यापारिक ढांचा बहुत मजबूत है और दोनों देशों के बीच कई व्यापक आर्थिक समझौते (CECA) लागू हैं। सिंगापुर के बंदरगाहों की विश्वस्तरीय दक्षता और राजनीतिक स्थिरता ने भारतीय कंपनियों को अपने व्यापारिक मार्ग पूर्वी एशिया की ओर मोड़ने के लिए प्रेरित किया है।

अर्थव्यवस्था के लिए इसके निहितार्थ:
यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन (Resilience) को भी प्रदर्शित करता है। जब एक दिशा में संकट उत्पन्न हुआ, तो भारतीय व्यापार ने तुरंत दूसरी दिशा में अपने अवसर तलाश लिए। यह ‘लुक ईस्ट’ (Look East) और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक विजय भी है।

सिंगापुर का भारत के दूसरे सबसे बड़े निर्यात गंतव्य के रूप में उभरना केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार में आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन का संकेत है। पश्चिम एशिया का संकट जब तक पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाता, तब तक सिंगापुर और अन्य पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत का व्यापारिक जुड़ाव इसी प्रकार गहराता रहेगा। यह स्थिति भारतीय निर्यात को नई दिशा और स्थायित्व प्रदान करने का एक स्वर्णिम अवसर है।

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